220 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
है - संयुक्त राज्य से भी अधिक कठिन है भारत में जातियाँ हैं, जातियाँ राष्ट्र विरोधी हैं। सबसे पहले तो यह कि उनके कारण सामाजिक जीवन में पृथकता आती है। वे लोग राष्ट्र विरोधी भी है, क्योंकि विभिन्न जातियों के बीच ईर्ष्या और वैमनस्यता का भाव पैदा होता है। लेकिन यदि हम वास्तव में एक राष्ट्र बनने के इच्छुक हैं, तो हमें इन सभी कठिनाइयों से उबरना होगा। राष्ट्र होने पर ही भाईचारा आ सकता है, भाईचारे के बिना, समानता और स्वतंत्रता पैंट की क्रीज से अधिक गहरी नहीं मानी जा सकती है।
हमारे सामने जो कार्य बाकी है, उनके बारे में मेरा यह विचार है। यह कहने का कोई लाभ नहीं है कि इस देश में राजनीतिक ताकत लंबे समय तक कुछ लोगों का एकाधिकार रही है और अधिकतर लोग उसके बोझ से दबे ही नहीं रहे हैं बल्कि उसके शिकार भी होते रहे हैं, इस एकाधिकार ने न सिर्फ उन लोगों को अपनी बेहतरी के मौके से वंचित होना पड़ा है, इस कारण उन लोगों की जिंदगी अपना महत्व भी खोती रही है, ये दलित वर्ग शासित होते होते थक चुके हैं, उन लोगों में स्वयं शासन करने की अधीरता व्याप्त है। ... वर्गों में मौजूद इस आत्मभावना को वर्ग संघर्ष या वर्ग युद्ध में बदलने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए, इससे सभा में विभाजन हो जाएगा। वह वास्तव में विनाश का दिन होगा। जैसा कि अब्राहम लिंकन कह चुके हैं कि स्वयं में विभाजित सभा लंबे समय तक नहीं चल सकती। इसलिए उनकी आकांक्षा को जितनी जल्दी समायोजित किया जा सके यह उन मुठ्ठी भर लोगों की बेहतरी, देश की बेहतरी, इसकी स्वतंत्रता को बनाए रखने की बेहतरी और इसकी लोकतांत्रिक संरचना को जारी रखने की बेहतरी के लिए जरूरी होगा। यह जीवन के सभी क्षेत्रों में समानता और भाईचारा स्थापित करके ही हो सकता है।
मैं सभा को आगे और नहीं थकाना चाहता हूँ। स्वतंत्रता निःसंदेह खुशी की बात हैं लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए स्वतंत्रता हम लोगों पर भारत जिम्मेदारियाँ भी डालती है। स्वतंत्र होने के बाद, सभी गलत बातों के लिए अंग्रेजों को दोषी ठहराने का बहाना समाप्त हो चुका है। यदि इसके बाद कुछ भी गलत होता है, तो हम स्वयं के द्वारा लोगों के लिए वाली बात पर उदासीन है। यदि हम संविधान को अक्षुण रखना चाहते हैं तो हमें लोगों का लोगों के लिए, लोगों के द्वारा शासन के सिद्धांत को स्वीकार करना चाहिए, हमें संकल्प लेना चाहिए कि हमारे मार्ग में व्याप्त बुराईयों की पहचान जल्दी करेंगे जो लोगों के लिए पर शासन करने की व्यवस्था को प्राथमिकता देते हैं, हमें ऐसे लोगों को निकालने की पहल करने में कमजोर नहीं पड़ना चाहिए। देश की सेवा करने का यही एक मात्र तरीका है। मुझे और किसी बेहतर तरीके की जानकारी नहीं है।
* सी.ए.डी. अधिकारिक प्रतिवेदन, खंड XI 26 नवंबर 1949, पृष्ठ 5994