अनुच्छेद 304 - Page 42

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मेरी राय में अति फिजूल और बड़ी मांग है जिसे उन लोगों द्वारा स्वीकार किया जाना कठिन है, जिन्हें संविधान प्रारुपित करने की जिम्मेदारी दी गई है।

इसलिए मैं पहली बात जिस पर जोर देना चाहता था वह यह है कि यह कहना पूरी तरह से मिथ्या धारणा है कि संविधान में कोई भी ऐसा अनुच्छेद नहीं है जिसे साधारण बहुमत द्वारा संशोधित किया जा सकता है। जैसा कि मैं बता चुका हूँ, हमारे संविधान में कई अनुच्छेद है जिन्हें संसद साधारण बहुमत द्वारा संशोधित कर सकती है।

अब, हमने इसमें क्या किया है? हमने संविधान को तीन श्रेणियों में बांट दिया है। पहली श्रेणी तो उन अनुच्छेद क है, जिन्हें संसद द्वारा साधारण बहुमत से संशोधित किया जा सकता है। दूसरे अनुच्छेदों की ऐसी श्रेणी है, जिनके संशोधन के लिए दो-तिहाई बहुमत की जरूरत है। यदि भावी संसद किसी अनुच्छेद जो भाग III या 304 में उल्लिखित नहीं है, का संशोधन करना चाहे, तो उसके लिए केवल संशोधन किया जा सकता है।

श्री सभापतिः उपस्थित सदस्यों का बहुमत।

माननीय डा. बी. आर. अम्बेडकरः जी हाँ, निःसंदेह हमने कतिपय अनुच्छेदों को तीसरी श्रेणी में रख दिया है जिनमें संशोधन का तरीका कुछ अलग है या बल्कि प्रक्रिया दोहरी है। इसमें दो-तिहाई बहुमत के साथ राज्यों द्वारा पुष्टि किया जाना आवश्यक है। मैं यह बताता हूँ कि हमने कतिपय अनुच्छेदों के मामले में इस प्रक्रिया को अपना बांछनीय क्यों माना। यदि सभा के सदस्य इस पर तुक के अंतर्गत रखे गए अनुच्छेदों की जाँच करने के इच्छुक हों, तो वें यह पाएँगे कि इसमें केवल केंद्र के बारे में ही जिक्र नहीं है, बल्कि केंद्र और प्रांतों के बीच संबंधों का भी जिक्र है। हम इस तथ्य को भूल नहीं सकते कि जहाँ बहुत सारे मामले हैं। जिनमें हमने प्रांतीय में हस्तक्षेप किए हैं, पर अभी भी मंशा रखते हैं तथा इस तथ्य का ध्यान भी रखा है कि संविधान की केन्द्रियता की मौलिक सरंचना नहीं बदली जाए। हमने कानून बनाकर कुछ अधिकार प्रांतों को दिए हैं, तो कुछ अधिकार केंद्र के लिए आरक्षित रखे हैं। हमने विधायी प्राधिकार वितरित किए हैं। हमने कार्यपालक प्राधिकार वितरित किए हैं और हमने प्रशासनिक प्राधिकार वितरित किए हैं। स्पष्ट रूप से कहें तो प्रशासनिक विधायी, वित्तीय और अन्य शक्तियों से संबंधित संविधान के उन अनुच्छेदों जैसे कि प्रांतों की कार्यपालक शक्तियों को केंद्रीय संसद द्वारा दो-तिहाई बहुमत से परिवर्तन किए जाने के लिए छोड़ दिया जाए और उन मामलों में प्रांतों अथवा राज्यों की सुनी नहीं जाए, तो मेरे हिसाब से यह संविधान की मौलिकता का हनन करने जैसा होगा। यदि मेरे माननीय मित्रगण इस प्रतिबंध में शामिल