अनुच्छेद 304 - Page 43

28 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

अनुच्छेदों को देखें तो वे यह अनुच्छेद 44 राष्ट्रपति के चुनाव के तरीके से संबंधित है। प्रारुप समिति का यह विचार चुनाव और चुनाव के तरीके के बारे में केंद्र से कम रुचि नहीं है। परिणामतः हमने यह सोचा कि इन मामलों को उन अनुच्छेदों की श्रेणी में रखने के लिए उपयुक्त है, जिसमें प्रांतों से पुष्टि कराने की जरूरत कम होती है।

अनुच्छेद 60 और अनुच्छेद 142 को लें। अनुच्छेद केंद्र की कार्यपालक शक्ति से संबंधित है और अनुच्छेद 142 राज्य के कार्यपालक प्राधिकार से संबंधित है। हमने अपने संविधान में यह मौलिक प्रतिपादन निर्धारित कर रखा है कि विधायी प्राधिकार के साथ कार्यपालक प्राधिकार का सह-अस्तित्व बना रहेगा। उदाहरण के लिए मान लें कि संसद को अनुच्छेद 60 में अंतर्विष्ट उपबंधों या सीमा के आगे जाकर कार्यपालक प्राधिकरण घटेगा या समिति होगा, और इसलिए हमने इसे मूलभूत मामला मानते हुए उसमें राज्यों द्वारा पुष्टि किया जाना आवश्यक बनाया है।

अध्याय IV भाग V उच्चतम न्यायालय से संबधित है। इसमें कोई संदेह नहीं हो सकता कि उच्चतम न्यायालय एक ऐसा न्यायालय है जिसमें केंद्र तथा राज्यों या इकाइयों और इस देश के प्रत्येक नागरिक का हित जुड़ा हुआ है और इसलिए, इस मामले को केवल दो-तिहाई बहुत से निर्णय के लिए नहीं छोड़ा जा सकता। भाग VI के अध्याय VII में उल्लिखित उच्च न्यायालयों के बारे में भी यही स्थिति है।

भाग IX का अध्याय I तीसरी श्रेणी में शामिल किया गया, जो विधायी शक्ति के वितरण से संबंधित है और (क) सातवीं अनुसूची की सूचियों से संबंधित है। कोई भी इससे इनकार नहीं कर सकता कि राज्यों का इस मामले में मौलिक हित जुड़ा हुआ है और उनकी सहमति के बिना इसमें कोई बदलाव नहीं किया जाना चाहिए। उसी प्रकार से राज्यों के परिषद में राज्यों का प्रतिनिधित्व का मामला भी अनुच्छेद 67 से संबंधित है।

मैं समझता हूँ कि सदस्यगण यह देखेंगे कि प्रारुप समिति द्वारा अपनाए गए सिद्धांतों पर उन लोगों को छोड़कर कोई प्रश्न नहीं खड़ा कर सकता जो यह चाहते हैं कि पूरे संविधान में या उसके प्रत्येक अनुच्छेद में साधारण बहुमत से ही बदलाव किए जाने का उपबंध किया जाना चाहिए। जैसा कि मैं बता चुका हूँ कि मैं उस स्थिति को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हूँ। संविधान एक मौलिक दस्तावेज होता है। यह एक ऐसा दस्तावेज होता है जिसमें राज्य के तीन अंगों - परिभाषित किया जाता है, जैसा कि हमने मूलाधिकारों से संबंधित अपने अध्याय में किया है या फिर वस्तुतः संविधान का उद्देश्य राज्य का अंग ही सृजित करना नहीं होता है बल्कि उसके प्राधिकार को भी समिति करना होता है क्योंकि यदि राज्य के अंगों के प्राधिकार पर सीमा नहीं लगाए