29
जाएँगे, तो फिर पूरी तरह से निरंकुश और अत्याचार का शासन हो जाएगा। विधानमंडल कोई भी कानून बनाने के लिए स्वतंत्र हो सकता है। कार्यपालिका कोई भी निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हो सकती है और उच्चतम न्यायालय कानून की कोई भी व्याख्या करने के लिए स्वतंत्र हो सकता है। इसके परिणामस्वरूप पूरी तरह से अराजकता की स्थिति पैदा हो जाएगी। महोदय यह जो कहा जाता है कि संविधान को साधारण बहुमत से ही संशोधन किए जाने का खुला विकल्प होना चाहिए। मैं इसका कारण समझने में असमर्थ हूँ और जब मैं इस माँग के पीछे की भावना समझने की कोशिश करता हूँ, तो मुझे तीन ही कारण समझ में आते हैं। एक तो यह कि प्रारुप समिति ने जो प्रारुप तैयार किया है वह प्रारुपण की दृष्टि से बहुत खराब है। मैं उस स्थिति को अच्छी तरह समझ सकता हूँ। यदि ऐसा है .......
श्री महावीर त्यागीः ऐसा नहीं है।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः हो सकता है कि ऐसा नहीं हो। मैं प्रारुप समिति के अध्यक्ष के रूप में और स्वयं के आधार पर मैं समझता हूँ कि प्रारुप समिति के मेरे अन्य सहयोगियों को भी इस बात पर कोई आपत्ति नहीं होगी यदि यह संविधान सभा दूसरी प्रारुप समिति नियुक्त करे या फिर किसी संसदीय प्रारुपकार को मंगाकर उससे इसका प्रारुप तैयार करने को कहे तथा उसे इनमें मौजूद दोषों का पता लगाने और सुझाव देने के लिए भी कहे। वह एक ईमानदार प्रक्रिया होगी और मुझे इस पर कोई आपत्ति भी नहीं है।
यदि इस तर्क का यह आधार नहीं है तो फिर दूसरा आधार यह है कि संविधान कुछ गलत सिद्धांतों पर आगे बढ़ रहा है। महोदय, जहाँ तक इस मामले का संबंध है मुझे यह लगता है कि कोई भी आधुनिक सिद्धांत केवल दो ही आधारों पर आगे बढ़ सकता हैः एक आधार तो सरकार की संसदीय प्रणाली का होना है। दूसरा आधार सर्व सत्तात्मक या तानाशाही सरकार का होना है। यदि हम इस बात पर सहमत हों कि हमारा संविधान तानाशाही व्यवस्था पर आधारित नहीं होना चाहिए बल्कि यह एक ऐसा संविधान होना चाहिए जिसमें संसदीय लोकतंत्र की व्यवस्था हो और जहाँ सरकार हमेशा ही परीक्षण के दौर से गुजरती रहती हो और वह लोगों के प्रति जवाबदेह रहे, वह न्यायपालिका के प्रति जवाबदेह रहे, तो फिर मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि इस सिद्धांत में अंतर्निहित सिद्धांत किसी अन्य संसदीय संविधान में अंतर्निहित सिद्धांतों से बेहतर नहीं तो कम से कम उनके बराबर तो है ही।
अन्य तर्क जो संभवतः दिए गए होंगे - मैं बोलने वाले प्रत्येक सदस्य की बात नहीं सुन पाया हूँ - वह यह है कि इस सभा का स्वरूप प्रतिनिधिमूलक नहीं है