अनुच्छेद 311-क - Page 59

44 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

डा. पी. एस. देशमुखः चूंकि मेरे संशोधन के पीछे अंतर्निहित को सिद्धांत स्वीकार कर लिया गया है, इसलिए मैं अपना संशोधन प्रस्तुत करना जरूरी नहीं समझता।

श्री सभापतिः अनुच्छेद और संशोधन पर अब खुली चर्चा की जा सकती है।

* * * * *

प्रो. शिब्बन लाल सक्सेनाः सभापति महोदय, मैं आशा करता हूँ कि डॉ. अम्बेडकर इस सुझाव के औचित्य पर गौर करेंगे और ‘‘संसद’’ शब्द के पहले आए ‘‘अनंतिम’’ शब्द को लोप कर देंगे जैसा कि उन्होंने राष्ट्रपति के मामले में किया है।

डॉ. माननीय बी.आर. अम्बेडकरः मुझे नहीं लगता कि ‘‘अनंतिम ससंद’’ शब्दों को बनाए रखने के मामले में कोई बहुत अधिक आपत्ति हो सकती है। मैं उसमें कोई बदलाव करने का प्रस्ताव नहीं करता। इसे ‘‘अनंतिम संसद’’ नहीं कहा जाएगा लेकिन इस अनुच्छेद की भाषा के प्रयोजनार्थ मैं समझता हूँ यह कहना जरूरी है कि वह अनंतिम संसद है।

श्री आर.के. सिधवाः लेकिन मैंने तो यह सोचा था कि डा. अम्बेडकर अनंतिम शब्द को हटाने पर सहमत हो गए हैं।

श्री सभापतिः नहीं, यह संसद के संदर्भ में है। श्री शिब्बन लाल सक्सेना यह चाहते थे कि ‘‘ससंद’’ शब्द से पहले आए ‘‘अनंतिम’’ शब्द को हटा दिया जाए।

डॉ. पी.एस. देशमुखः यदि ऐसा है, तो मैं अन्य स्थानों पर भी ‘‘अनंतिम’’ शब्द का लोप किए जाने हेतु अपना संशोधन प्रस्तुत करना चाहता हूँ।

श्री सभापतिः क्या आपका संशोधन संसद के भी संदर्भ में है?

डॉ. पी.एस. देशमुखः जी हाँ, महोदय!

श्री सभापतिः श्री शिब्बन लाल सक्सेना ने इसे प्रस्तुत किया है। उस पर मत लिया जाएगा। अब मैं विभिन्न संशोधनों पर मत लूँगा।

प्रस्ताव हैः

प्रस्ताव स्वीकृत हुआ।