अनुच्छेद 308 - Page 71

56 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

श्री सभापतिः यह जाने बगैर कि संविधान में क्या-क्या बातें रखी जा रही हैं!

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर (बंबईः जनरल)ः मेरे मित्र को पूरी तरह से गलत सूचना मिली है। वह नहीं जानते हैं कि क्या हो रहा है।

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[ अनुच्छेद 307 यथासंशोधित रूप में संविधान में जोड़ा गया। ]

अनुच्छेद 308

1 श्री सभापतिः हम अनुच्छेद 308 को लेते हैं।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः महोदय, मैं प्रस्ताव करता हूँः

‘‘कि अनुच्छेद के खंड (3) के स्थान पर निम्नलिखित खंड प्रतिस्थापित किए जाएँः-

(3) इस संविधान की कोई बात भारत के राज्य क्षेत्र के भीतर किसी

न्यायालय के किसी निर्णय, डिक्री या आदेश की या उसके संबंध में अपीलों

और याचिकाओं को निपटाने के लिए सपरिषद् हिज मजेस्टी द्वारा अधिकारिता

के प्रयोग को वहाँ तक अविधिमान्य नहीं करेगी जहाँ तक ऐसी अधिकारिता

का प्रयोग विधि द्वारा प्राधिकृत है और ऐसी अपील या याचिका पर इस

संविधान के प्रारंभ के पश्चात् किया गया सपरिषद हिज मजेस्टी का कोई

आदेश सभी प्रयोजनों के लिए ऐसे प्रभावी होगा, माना वह उच्चतम न्यायालय

द्वारा उस अधिकारिता के प्रयोग में जो ऐसे न्यायालय के साथ ही, अनुच्छेद

308 के खंड के पश्चात् निम्नलिखित नया खंड प्रतिस्थापित किया जाएः

(3क) इस संविधान की पहली अनुसूची के भाग प्प्प् में विनिर्दिष्ट किसी

राज्य में प्रिवी कौंसिल के रूप में कार्यरत प्राधिकारी को उस राज्य के भीतर

किसी न्यायालय के किसी निर्णय, डिक्री या आदेश की या उसके संबंध में

अपीलों और याचिकाओं को ग्रहण करने या निपटाने की अधिकारिता समाप्त

हो जाएगी और उक्त प्राधिकारी के समक्ष ऐसे प्रारंभ पर लंबित सभी अपीलें

और अन्य कार्यवाहि याँ उच्चतम न्यायालय को अंतरित कर दी जाएँगी और

उसके द्वारा निपटाई जाएँगी।

* सी.ए.डी खंड 10, 10 अक्तूबर, 1949 पृष्ठ 72-73