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महोदय, पहले संशोधन का प्रयोजन प्रिवी काउंसिल को उसके समक्ष कानून, जिसे संविधान सभा ने बहुत हाल में पारित किया है, के अधीन लंबित पड़ी कतिपय अपीलों को निपटाने का प्राधिकार बनाए रखना है। इस कानून की धारा 4 में कहा गया है - यदि 26 जनवरी उसे इस संविधान को लागू होने की तिथि माना जाए, से पहले वे मामले अंतिम रूप से निपटाए नहीं जाते हैं। महत्वपूर्ण शब्द है - अपील निपटाने के लिए।’’ अपील स्वीकार करने की शक्ति नहीं है। और अन्य महत्वपूर्ण शब्द है-’’ कानून द्वारा प्राधिकृत ऐसी अधिकारिता अर्थात हाल में पारित अधिनियम का संदर्भ लिया गया है। प्रिवी काउंसिल की और दूसरी अधिकारिता नहीं होगी, हमने जो अधिकारिता उसे प्रदान की है, उससे अधिक अधिकारिता नहीं होगी। परामर्श के द्वारा ऐसी व्यवस्था की गई कि संभवतः जिस दिन संविधान लागू होगा, उस दिन तक प्रिवी काउंसिल उन सभी मामलों को निपटा चुका होगा, जो कि उस अधिनियम विशेष के अधीन उसके द्वारा निपटाने के लिए छोड़ा गया है। लेकिन हो सकता है कि कोई मामला आधा ही सुना गया हो या किसी मामले को इस अर्थ में निपटाया जा चुका हो कि उस पर सुनवाई तो पूरी हो चुकी हो, किंतु डिक्री नहीं दी गई हो और उस अर्थ में यह उसके पास लंबित पड़ा हो। यह महसूस किया गया कि उन मामलों, जिनकी आधी सुनवाई हो चुकी हो, जिन्हें निपटाया जाना बाकी हो, को उच्चतम न्यायालय में स्थानान्तरण करने का उपबंध करने की बजाए हमारे सामान्य नियम कि प्रिवी काउंसिल की अधिकारिता संविधान लागू होने की तिथि को खत्म हो जाएगी। संशोधन संख्या 6 का मुख्य प्रयोजन यही है।
संशोधन संख्या 7 के संबंध में यह सर्वविदित है कि कुछ भारतीय राज्यों में प्रिवी काउंसिल हैं, जो उनके उच्च न्यायालयों का पर्यवेक्षण करते हैं, इसका कारण यह है कि उन राज्यों ने प्रिवी काउंसिल या यह कहें कि इंग्लैंड की हिज मेजेस्टी के प्रिवी काउंसिल को मान्यता नहीं दी है। इसलिए उन राज्यों का अपना प्रिवी काउंसिल था। अब यह महसूस किया जा रहा है कि संविधान के उपबंध के दृष्टिगत राज्यों में भाग III तथा भाग I दोनों में ही उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय के बीच प्रत्यक्ष संबंध होना चाहिए, भाग III में किसी भारतीय राज्य में प्रिवी काउंसिल की यह इस अंतरमाध्यमिक संस्था को सांविधिक रूप से समाप्त किया जाना चाहिए, ताकि 26 जनवरी को किसी भी राज्य से सभी अपीलें भाग III के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय के समक्ष स्वतः ही निपटाने के लिए आ जाएँं।
मुझे बताया गया कि इन प्रिवी काउंसिल को अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग नाम दिए गए हैं। यदि यह बात है तो प्रारुप समिति उस कठिनाई से उबरने के लिए अपने अनुच्छेद 306 में प्रिवी काउंसिल को इस ढंग से परिभाषित करेगी कि विभिन्न नामों और रूपों से व्याप्त इन सभी संस्थाओं को शामिल किया जा सके।