58 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
* * * * *
1 श्री सभापतिः डॉ. अम्बेडकर, क्या आप कुछ कहना चाहेंगे?
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः महोदय, मुझे नहीं लगता कि इन संशोधनों के मामले में जो कुछ कहा गया है उनमें कुछ भी सार है। यह भावनात्मक मामला कहीं अधिक और मेरे विचार से सुविधा की दृष्टि से इस खंड को बनाए रखना चाहिए और करने में किसी को भी किसी रूप में अपमानित नहीं महसूस होना चाहिए, क्योंकि यदि खंड (3) में उल्लिखित सीमित संदर्भ में प्रिवी काउंसिल की अधिकारिता जारी रहने भी जाती है तो इस तथ्य को नहीं भूलना चाहिए और मेरे विचार से मेरे मित्रगण जिन्होंने यह संशोधन प्रस्तुत किए हैं, इस तथ्य को भूल चुके हैं कि अधिकारिता प्रिवी काउंसिल की अधिकारिता अंतनिर्हित नहीं, बल्कि यह अधिकारिता उन्हें इस सभा द्वारा प्रदान की गई है। वस्तुतः प्रिवी काउंसिल कतिपय जरूरी और महत्वपूर्ण कार्य को पूरा करने के लिए इस सभा के एजेंट के रूप में कार्य करेगी। मैं इसलिए यह नहींसमझता हूँ कि किसी प्रकार का अपमान महसूस करने का कोई कारण नहीं है या हम वास्तव में अपनी स्वतंत्रता को नहीं खो रहे हैं।
मेरे मित्र प्रो. सक्सेना ने जो अनुच्छेद 308 की पाद-टिप्पणी में जो मुद्दा उठाया है, उसके बोर में मैं मुक्त रूप से स्वीकार करता हूँ कि प्रारुप समिति ने बेहतर ढंग से विचार करने पर यह पाया कि कठिनाई खंड को हटाने से इसका प्रयोजन पूरा नहीं हो सकता है। सभी प्रकार की शंका के लिए हमने संविधान में ही क्षेत्राधिकार का उपबंध करने हेतु एक पृथक खंड रखना बेहतर समझा।
{ पूर्व में उल्लिखित डॉ. अम्बेडकर के सभी संशोधन स्वीकृत हुएः अन्य संशोधन अस्वीकृत हुए। }
1 सी.ए.डी. खंड 10, 10 अक्तूबर, 1949, पृष्ठ 65