अनुच्छेद 311 - Page 77

62 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

इस प्रकार का कोई उपबंध नहीं होने के कारण कतिपय विषमता की स्थिति व्याप्त है। मैं स्वयं और प्रारुप समिति इन दो उपबंधों के बीच के व्याप्त इस अंतर के प्रति सचेष्ट रहें और हमने इस कमी को दूर करने के लिए बाद में एक संशोधन प्रस्तुत करने की मंशा जाहिर की थी। श्री कामथ इसलिए इस बात के लिए आश्वस्त हो जाएँ कि प्रारुप समिति इस अंतर को बना रहने नहीं देगी बल्कि इस कमी को एक संशोधन द्वारा दूर कर देगी।

एक, दूसरे संशोधन, जिसे मेरे मित्र मुन्नीस्वामी पिल्लै ने अनंतिम संसद में अनुसूचित जातियों के प्रतिनिधित्व के संबंध में उठाया था, के बारे में कुछ सार नजर आता है। स्थिति इस प्रकार है। वर्तमान में इस सभा में 310 सदस्य हैं और अनंतिम संसद में भी सदस्यों की संख्या 310 होगी। जनसंख्या के आधार पर, जो कि भावी संसद में अनुसूचित जातियों के प्रतिनिधित्व के लिए सिद्धांत के रूप में स्वीकृत है, पर पूरी तरह से आधारित होकर उन्हें इस 310 की संख्या में से 45 स्थान मिलने चाहिए। जबकि स्थिति यह है कि आज उन्हें केवल 28 स्थान प्राप्त हैं। इस अनुच्छेद में एक निश्चित उपबंध किया गया है कि वर्तमान में उनकी जो 28 की संख्या है उसमें कोई नहीं की जाएगी। लेकिन 45 की संख्या प्राप्त करने के लिए जो अंतर मौजूद है उसके संबंध में जनसंख्या के आधार पर, जिसके वह हकदार हैं वह नहीं मिल पाया है और उन्हें केवल 28 स्थान ही प्राप्त हैं, मेरे विचार से हमने नियमों में संशोधन करने तथा उन्हें स्वीकार करने के मामले में राष्ट्रपति के हाथ में पर्याप्त शक्ति प्रदान कर रखी है ताकि इस कमी को दूर किया जा सके और नये अनुच्छेद 312च के उपबंधों के अधीन जहाँ तक यह व्यवहारिक हो सकेगा, उसे किया जाएगा।

अब मैं श्री पटास्कर के संशोधन पर आता हूँ। जहाँ तक मैं उनकी बात को समझ पाया हूँ प्रारुप अनुच्छेद और उनके द्वारा सुझाए गए संशोधन के बीच वास्तव में कोई अंतर नहीं है। दोनों ही अनुच्छेद 311 जिसे मैंने प्रस्तुत किया है तथा श्री पटास्कर द्वारा प्रस्तुत किए गए संशोधन में इस बात पर सहमति व्यक्त की गई है कि हमें दोहरी सदस्यता को समाप्त करने के लिए एक संशोधन के लिए एक उपबंध करना चाहिए। एकमात्र प्रश्न यह रह गया है कि इसे किस प्रकार किया जाना है। इस अनुच्छेद में अंतर्विष्ट उपबंधों के अनुसार, यह कहा गया है कि इस संविधान के लागू होने के बाद भी रिक्तियाँ उपस्थित होंगी। वह उस स्थिति अर्थात् 25 जनवरी, 1950 यदि 26 जनवरी को संविधान के लागू होने की तिथि मान लिया जाए तो वह सदस्य के रूप में बने रहेंगे और कार्य करते रहेंगे। लेकिन इस प्रकार से रिक्त हुए स्थानों को भरने के लिए चुनाव इस संविधान के लागू होने से पूर्व किसी भी समय कराया जा सकता है ताकि संविधान सभा जब अनंतिम संसद के रूप में समवेत हो तो उसकी सदस्यता में अचानक हुई कमी नहीं हो सके। मेरे मित्र पटास्कर यह चाहते हैं कि वह रिक्ति संविधान के लागू होने के