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की सूचना दी है। उससे स्थिति स्पष्ट हो जाएगी।
1 माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः महोदय, जहाँ तक अनुदेशों के साधन का संबंध है। दो बातें ध्यान में रखी जानी चाहिए। अनुदेश का साधन के प्रयोजन के मूल रूप में ब्रिटिश संविधान में प्रावधान किया गया था क्योंकि उपनिवेशों की सरकार को राज्यों के प्रमुखों को कतिपय निदेश देने की जरूरत थी कि वे लोग अपनी विवेकाधीन शक्तियों का प्रयोग किस प्रकार से करें जो उन लोगों को दी गई थी। अब ये साधन उन गर्वनर या वाइसराय के मामले में प्रभावी रहे जिन्हें ये अनुदेश राज्य के सचिव के प्राधिकार के विषयाधीन दिए गए थे। यदि किसी मामला विशेष का स्वरूप गंभीर हो, उदाहरण के लिए गर्वनर ने स्वयं को जारी अनुदेशों के साधन को मानने से लगातार मना किया, राज्य के सचिव के लिए खुला विकल्प था कि उस गर्वनर को हटा दें तथा अनुदेशों के साधन को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए कोई दूसरा गर्वनर कर दें। जहाँ तक हमारे संविधान का संबंध है। इसमं कोई भी ऐसा प्राधिकार नहीं नियुक्त किया गया है, तो यह सुनिश्चित करें कि अनुदेशों के साधन को गर्वनर द्वारा विश्वासपूर्वक लागू किया जाए।
दूसरे इस संविधान के अधीन जो विवेकाधिकार गर्वनर को देने जा रहे हैं, वह बहुत ही क्षीण हैं। उसे कोई विवेकाधिकार नहीं दिया गया है। उसे कैबिनेट के सदस्यों के चुनाव के मामले में प्रधानमंत्री की सलाह के अनुरूप कार्य करना है। उसे कोई कार्यपालक विधायी कार्रवाई विशेष के मामले में भी प्रधानमंत्री और उसके मंत्रियों की सलाह के अनुरूप कार्य करना है। ऐसी स्थिति में मान लें कि प्रधानमंत्री किसी भी कारण या परिस्थिति विशेष में अपने कैबिनेट के सदस्यों में अल्पसंख्यक समुदाय के किसी व्यक्ति को शामिल नहीं करता है, तो इस तथ्य के बावजूद कि हम उसे इस अनुदेश के साधन के माध्यम से विशेष तरीके से कार्य करने के लिए कह सकेंगे, पर गर्वनर कुछ भी नहीं कर सकेगा। इसलिए इस तथ्य को देखते हुए कि गर्वनर को कोई विवेकाधिकार नहीं है और संविधान के अधीन कोई मशीनरी नहीं है जो इसे लागू कर सकता है। इसलिए यह महसूस किया गया कि कोई ऐसे निदेश नहीं दिए जाने चाहिए। वे सब अनुपयोगी हैं और उससे किसी उद्देश्य की प्राप्ति नहीं हो सकती। इसलिए, इन परिस्थितियों में यह महसूस किया गया कि अनुदेशों के साधन का प्रावधान करना वांछनीय नहीं है, जो विभिन्न परिस्थितियों के अंदर वास्वत में प्रभावी नहीं हो सके और इस बात की कल्पना तक नहीं की जा सकती कि यह प्रावधान नए संविधान में विद्यमान रहेगा। यह मुख्य कारण है कि क्योंकि अनुदेशों के इस साधन को अवांछनीय माना गया।
श्री सभापतिः प्रस्ताव हैः
‘‘कि चौथी अनुसूची का लोप किया जाए’’ प्रस्ताव स्वीकृत हुआ। चौथी अनुसूची संविधान से हटा दी गई।
1 सी.ए.डी. खंड 10, 11 अक्तूबर, 1949, पृष्ठ 114