भाग V - Page 89

74 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

न्यायालय के न्यायाधीशों को दो श्रेणियों में विभाजित किया गया है - एक तो वे जिन्हें 31 अक्तूबर, 1948 से पूर्व नियुक्त किया गया हो और एक वे लोग जिन्हें 31 अक्तूबर, 1948 के बाद नियुक्त किया गया हो। पहले श्रेणी के मामले में अर्थात् 31 अक्तूबर, 1948 से पूर्व नियुक्त किए गए न्यायाधीशों को वैयक्तिक वेतन मिलेगा जोकि दूसरी अनुसूची द्वारा निर्धारित किए गए वेतन तथा संविधान के लागू होने के तुरंत पूर्व ऐसे न्यायाधीश को मिलने वाले वेतन के बीच के अंतर के समतुल्य होगा। 31 अक्तूबर, 1948 के बाद नियुक्त किए गए न्यायाधीशों को दूसरी अनुसूची में निर्धारित दरों के अनुरूप वेतन मिलेगा ताकि उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को संविधान के अधीन मुख्य न्यायाधीश के लिए निर्धारित वेतन से 2000/- रूपए अधिक मिलेगा जबकि फेडरल न्यायालय के न्यायाधीश को यदि वह उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीश बनता है तो उसे उच्चतम न्यायालय के अवर न्यायाधीश के लिए निर्धारित सामान्य वेतन से 1500/- रुपए अधिक मिलेगा।

अब मैं न्यायालय पर आता हूँ, संविधान के अधीन मुख्य न्यायाधीश के लिए निर्धारित सामान्य वेतन 4000/- रुपए है और अवर न्यायाधीशों के लिए सामान्य वेतन 3500/- रुपए है। यहाँ फिर हमने संविधान में एक उपबंध बनाया है कि उच्च न्यायालय को कोई न्यायाधीश यदि संविधान के अधीन नियुक्त किए जाने की इच्छा व्यक्त करता है तो राष्ट्रपति उसकी नियुक्ति करने के लिए बाध्य होगा और उसके परिणामस्वरूप वही समस्या खड़ी होगी जोकि उच्चतम न्यायालय के मामले में खड़ी होती है क्योंकि वे न्यायाधीश जो अभी वर्तमान में न्यायाधीश हैं कुछ मामलों में दूसरी सूची में निर्धारित वेतन से अधिक वेतन प्राप्त कर रहे हैं। ऐसी कोई संभावित शिकायत को दूर करने के लिए यह भी निर्णय लिया गया है कि इस मामले में भी वही प्रक्रिया अपनाई जाएगी जो कि फेडरल न्यायालय के मामले में अपनाई गई है अर्थात् न्यायाधीशों को दो श्रेणियों में विभाजित किया जाए एक तो वे जो 31 अक्तूबर, 1948 से पूर्व नियुक्ति किए गए हों और एक वे जिनकी नियुक्ति उसके बाद की गई हो। इस प्रकार से पहली श्रेणी के मामले में न्यायाधीशों को वैयक्तिक वेतन के रूप में अतिरिक्त वेतन प्राप्त होंगे जो कि संविधान द्वारा निर्धारित वेतन तथा उनके द्वारा वर्तमान में प्राप्त किए जा रहे वेतन के बीच के अंतर के समतुल्य होंगे और दूसरी श्रेणी के मामले में न्यायाधीशों को संविधान द्वारा निर्धारित वेतन ही मिलेगी।

संभवतः यह बताना जरूरी हो सकता है कि हमने 31 अक्तूबर, 1948 को विभाजन रेखा के रूप में क्यों स्वीकार किया। इसका उत्तर यह हैं कि भारत सरकार ने विभिन्न उच्च न्यायालयों तथा फेडरल न्यायालयों को यह अधिसूचित किया था कि कोई भी न्यायाधीश जिसे 31 अक्तूबर, 1948 से पूर्व नियुक्त किया गया हो, को वही वेतन