76 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
प्रतिमाह 20,900/- बैठता थ। निःसंदेह यह वेतन आयकर के विषयाधीन था। विधायी सभा द्वारा पारित हाल के अधिनियम के अधीन गवर्नर जनरल का वेतन 5,500/- रुपए प्रतिमाह निर्धारित किया गया था, लेकिन वह वेतन आयकर से मुक्त था। मुझे यह बताया गया है कि यदि गवर्नर जनरल के वेतन को आयकर के विषयाधीन रखा जाता तो यह लगभग 14,000/- रुपए प्रतिमाह के आस-पास बैठता है। राष्ट्रपति का वेतन 10,000/- रुपए निर्धारित करने के मामले में हमने दो कारकों पर विचार किया है। एक कारक तो यह है कि राष्ट्रपति का वेतन आयकर के विषयाधीन होना चाहिए। प्रारुप समिति तथा इस सभा के अधिकतर सदस्यों का यह मानना था कि कोई भी व्यक्ति जो संविधान के अधीन एक कर्मचारी हों अथवा सिविल सर्वेंट हों, उसे इस देश के आम लोगों के लिए लागू किए गए कोई भी वित्तीय उपाया की उत्तरदेयता से मुक्त नहीं रखा जाना चाहिए। परिणामतः हमने यह महसूस किया कि यदि राष्ट्रपति के वेतन को आयकर के विषयाधीन रखा जाता है तो उसके वेतन को बढ़ाया जाना वांछनीय है।
हमने राष्ट्रपति का वेतन 10,000/- रुपए निर्धारित किया है उसका दूसरा कारण यह है कि उच्चतम न्यायालय के विद्यमान मुख्य न्यायाधीश का वेतन 7,000/- रुपए है तो यह उस दृष्टि से परम आवश्यक है कि राष्ट्रपति का वेतन मुख्य न्यायाधीश के वेतन से अधिक होना चाहिए। इन सभी कारकों पर विचार करते हुए हमने उनका वेतन 10,000/- रुपए रखा जाना समुचित माना है।
फिर राष्ट्रपति के वेतन के साथ कतिपय भत्ते भी मिलेंगे। इन भत्तों के संबंध में मैं यह उल्लेख करना चाहता हूँ कि जब भारत सरकार अधिनियम, 1935 पारित किया गया था उस अधिनियम में गवर्नर जनरल का केवल वेतन ही निर्धारित किया गया था। भत्तों के संबंध में उस अधिनियम में कहा गया है कि काउंसिल में महामहिम आदेश के द्वारा भत्ते निर्धारित कर सकेंगे, लेकिन दुर्भाग्यवश भारत सरकार अधिनियम, 1935 के भाग 2 के उपबंधों को काउंसिल में महामहिम द्वारा कभी प्रभावी नहीं किया जा सका यद्यपि वर्ष 1937 में इस प्रकार के आदेश का एक प्रारुप तैयार किया गया था। अतः जहाँ तक भारत सरकार अधिनियम का संबंध है उसमें भत्तों के संबंध में कुछ भी नहीं कहा गया है और इसलिए उस अधिनियम से प्रारुप समिति को कोई भी आधार प्राप्त नहीं हुआ जिससे किसी निश्चित निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता था। परिणामतः प्रारुप समिति ने यह महसूस किया कि राष्ट्रपति के मामले में वही भत्ते दिए जाने का उपबंध किया जाना चाहिए जो कि संविधान के लागू होने के समय गवर्नर जनरल को मिल रहा हो। बाद में संसद इसके विषयाधीन राष्ट्रपति के वेतन और भत्ते में परिवर्तन कर सकती है और संबंधित राष्ट्रपति के कार्यकाल के दौरान इस प्रकार का कोई परिवर्तन नहीं किया जा सकता।
मैं सभा के समक्ष कुछ विचार रखना चाहता हूँ कि राष्ट्रपति को प्रारुप समिति