80 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
इसलिए मैं नहीं समझता कि हमने वेतन का जो स्तर निर्धारित किया है उसके ऊपर कोई गंभीर विवाद पैदा हो सकता है।
फिर मैं अपने मित्र श्री हिम्मतसिंह द्वारा संशोधन पर आता हूँ। मैं यह बताना चाहता हूँ कि उनके तथा मेरे मन में एक ही बात है और उनके प्रति काफी सहानुभूति है। लेकिन वह यह चाहते हैं कि मैं एक सामान्य सिद्धांत को स्वीकार करूँ अर्थात् भाग 1 में उल्लिखित किसी क्षेत्र में नियुक्त किए गए कोई न्यायाधीश। मैं समझता हूँ कि सामान्य संदर्भ में इन खंडों में कोई संशोधन प्रस्तुत करना वांछनीय नहीं है और इसका साधारण कारण यह है कि 31 अक्तूबर, 1948 के बाद हमारे संविधान के उपबंधों के बारे में यह नहीं कहा जा सकता है कि प्रांतीय आधार पर न्यायाधीशों के वेतन में कोई अंतर नहीं किया जा सकता। सभी न्यायाधीशों को एक ही वेतनमान में रखा गया है। इस तथ्य को कोई महत्व नहीं दिया गया है कि किसी क्षेत्र का उच्च न्यायालय कहाँ पर स्थित है। इसलिए किसी ऐसी विसंगति को हटाने के लिए किसी सामान्य उपबंध की जरूरत नहीं है क्योंकि ऐसी कोई विसंगति उत्पन्न होने की संभावना नहीं है। विसंगति इसलिए विद्यमान है क्योंकि भारत सरकार अधिनियम में न्यायाधीशों के वेतन के संबंध में कतिपय उपबंधों के अंतर्गत एक प्रांत और दूसरे प्रांत के बीच अंतर किया गया है। मैं अपने मित्र को यह बताना चाहता हूँ कि प्रारुप समिति यह आशा करती है कि इस विशेष मामले को दूसरे तरीके से निपटाया जाएगा। यदि ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है तो इस विशेष संशोधन को स्वीकार करने की आवश्यकता नहीं होगी और इसके कारण प्रभावित होने वाले व्यक्ति को लाभ भी दिया जा सकेगा। लेकिन यदि प्रारुप समिति यह पाती है कि ऐसी स्थिति उत्पन्न नहीं होगी तो फिर प्रारुप समिति किसी विशेष व्यक्ति की शिकायत को दूर करने के लिए एक विशेष संशोधन लाए जाने का अधिकार स्वयं के पास सुरक्षित रखेगी, जैसा कि हमारे दिमाग में है।
अपनी बात समाप्त करने से पूर्व मैं खंड में एक या दो शब्द जोड़ना चाहूँगा जिन्हें अनजाने में छोड़ दिया गया है। मैं भाग IV पैरा 11 के उप-पैरा (2) का उल्लेख करता हूँ! मैं सातवीं पंक्ति में ‘शैल’ शब्द के बाद निम्नलिखित शब्द जोड़ना चाहूँगाः
‘‘इस पैरा के उप-पैरा (1) में विनिर्दिष्ट वेतनों के अलावा।’’ पैरा 11.1 के उप-पैरा (3) में मेरा दूसरा संशोधन है। मैं जोड़ना चाहता हूँः
‘‘उच्च न्यायालय का’’
श्री एच.बी. कामथः यह मेरा संशोधन है।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मैं इसे स्वीकार करता हूँ और अब मैं