(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 100

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मार दें तो भी यह विश्व चलता रहेगा। ( माननीय सदस्यः एक पुरुष छोड़कर)। एक भी पुरुष नहीं। जी हाँ, मैं कहता हूँ कि यदि विश्व में सभी पुरुषों को मार दिया जाए, फिर भी यह विश्व चलता रहेगा तथा मानव जाति बनी रहेगी। ( माननीय सदस्यः प्रश्न)। मैं इसका स्पष्टीकरण दे सकता हूँ। यहां मेरे कई मित्र हैं जो मेरे वक्तव्य पर प्रश्न करते हैं। श्रीमान ठीक है, यदि आप आज ही सभी पुरुषों को मार दें, फिर भी महिलाओं के गर्भ में लाखों पुरुष रहेंगे। इसलिए जहां तक विश्व का संबंध है, महिलाओं का महत्व अधिक है। परन्तु जो, पुरुष और महिला के बीच की समानता की बात करते हैं, वे वास्तव में महिला को पुरुष से अलग करना चाहते हैं। दम्पत्ति को खुश रखने में सहायता करने की जगह वे वास्तव में विनाशकारी हैं। जैसा मैंने कहा है कि उनका महत्व निर्विवाद है, वे लक्ष्मी हैं। साथ ही यह कठिन है कि अत्यधिक कठिन है कि पुरुष की तुलना महिला से की जाए। प्रकृति ने पुरुष और महिला को जन्म दिया है। उनके कार्य अलग-अलग हैं, उनके कर्तव्य अलग-अलग हैं। उनके व्यवहार अलग-अलग हैं। दोनों की तुलना करने का क्या हक है? कोई भी तुलना वास्तव में इस मामले में सही नहीं ठहर सकती।

मेरे मित्रों ने इस विधेयक के उपबंधों के बारे में चर्चा की है। मैं केवल एक या दो बातों को स्पष्ट करूंगा, जहां तक पिता की सम्पत्ति में बेटी का संबंध है। सर्वप्रथम मैं बेटा था, उसके बाद भाई हुआ, उसके बाद पति बना, तदुपरान्त पिता और इसी प्रकार आगे बढ़ता गया। मैं कह सकता हूँ कि इसमें कोई अपवाद नहीं है। परन्तु मैं यह कहता हूँ कि प्रत्येक हिंदू पिता, मैं भी हिंदू पिता हूँ और मैंने भी अपनी बेटियों का विवाह इधर-उधर किया है। अस्तु प्रत्येक हिंदू पिता अपनी बेटी का विवाह ऐसे परिवार में करना चाहता है जो प्रतिष्ठा में उच्च हो तथा उसके परिवार की तुलना में धन तथा अन्य बातों में उच्च हो। अब पिता की सम्पत्ति में बेटी के भाग की चर्चा की जा रही है। इस बारे में उपहास भी किया गया है। पर बेटी का प्रत्येक दृष्टि से सम्मान किया जाता है और उसे उसका भाग भी कह सकते हैं जो दहेज के रूप में पिता की सम्पत्ति में और इसी प्रकार अन्य बातें कही जा सकती हैं। जब अलग भाग का प्रश्न उठता है, तो इस विषय में क्या किया जाएगा। साधारणतया यदि आप मेरे घर पर अतिथि के रूप में आते हैं, तो मैं आपका स्वागत-सत्कार अपने मित्र के रूप में कई प्रकार से करूंगा। परन्तु यदि आप अधिकार लेकर आते हैं तो मैं नहीं समझता कि आप मुझ से स्वागत-सत्कार करवा सकेंगे। मैं अपने मित्रों से कहता हूँ कि इस कानून से किसी को भी सहायता नहीं मिलेगी। जैसे ही पिता की सम्पत्ति में बेटी का अधिकार निरुपित हो जाएगा, तभी से मेरा विचार है कि प्रेम का प्रश्न नहीं उठेगा। मेरे मित्र श्री कामथ ने, यद्यपि अनेक बातों के सुझाव दिए हैं, जिनको मैं स्वीकार नहीं करता परन्तु एक बात ऐसी है, जिससे मैं सहमत हूँ। एक परिवार ऐसा है, जिसमें पुरुष के पास एक बेटी और दो या तीन पुत्र हैं। बेटी का कई मील दूर एक स्थान पर विवाह हो जाएगा। यदि सम्पत्ति बहुत कम है और विवाह के बाद दामाद पिता के घर सम्पत्ति में भाग लेने के