84 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
पंडित लक्ष्मीकांत मैत्रेय (पश्चिम बंगालः सामान्य)ः श्रीमान, इस सदन में बोलना असंभव है। जब माननीय सदस्य ऐसे महत्वपूर्ण विधिकरण पर भाषण दे रहे हैं, तो उस पर असंख्य आलोचनाएं हो रही हैं, साथ टिप्पणियां की जा रही हैं। इसके साथ ही हंसी-मजाक भी चल रहे हैं। यह इस सदन की गरिमा के अनुकूल नहीं है। जो सदस्य, भाषण देना पसंद नहीं करते, वे शान्त रह सकते हैं, ताकि वे व्यक्ति सुन सकें, जो भाषण सुनना चाहते हैं।
माननीय अध्यक्षः माननीय सदस्य कृपया वक्ता को अपनी बात कहने दें।
बाबू रामनारायण सिंहः श्रीमान मैं धन्यवाद देता हूँ कि मेरे माननीय मित्र पंडित मैत्रेय का जिन्होंने मुझे प्रोत्साहन किया है। मैं समानता के बारे में बात कर रहा था। जहां तक विश्व के उद्देश्यों का प्रश्न है, तथा जहां तक मानव-जाति की निरंतरता का प्रश्न है, वहाँ पुरुष और महिला में समानता अथवा अपमानता का प्रश्न नहीं उठता। कोई भी व्यक्ति हाथ से पैर की तुलना नहीं कर सकता कि क्या हाथ अधिक उपयोगी नहीं हैं अथवा पैर अधिक उपयोगी है। क्या यह आंख उस आंख की तुलना में अधिक उपयोगी है? पुरुष और महिला एक हैं और वे एक से ज्यादा कुछ नहीं हैं। जहां तक कानून का संबंध है, मैं देश भर में अपनी सभी बहनों से कहना चाहता हूँ कि कानून उनकी सहायता नहीं कर सकता। ऐसी क्या वस्तु है, जो प्रत्येक व्यक्ति को लाभ पहुंचाए और विशेषकर महिलाओं को लाभ पहुंचाए? वह प्रेम है और प्रेम के सिवाय ऐसा कुछ भी नहीं हैं जो उन्हें आनन्द दे सके। यह ठीक है, उन्हें तलाक का अधिकार मिल सकता है। आज एक महिला को तलाक मिल सकता है, तो अगले दिन दूसरी महिला का विवाह हो सकता है। एक पत्नीत्व का अर्थ है, एक बार विवाह होना। अतः आप पुरुष को दूसरी पत्नी से विवाह करने की अनुमति नहीं देंगे। यदि पहली पत्नी का तलाक हो जाएगा तो वह पति दूसरे ही दिन अपना दूसरा विवाह कर सकता है। फिर तीसरे ही दिन वह पति उस पत्नी को भी तलाक दे देगा और चौथे दिन वह फिर विवाह कर लेगा। यह प्रक्रिया जारी रहेगी। जहां तक शुद्ध प्रेम का संबंध है, मेरे विचार से लोगों का चरित्र सबसे महत्वपूर्ण है। हमें यह महसूस करना चाहिए कि इस देश में लोगों ने सर्वप्रथम अपना चरित्र खो दिया और उसके बाद में अन्य सब कुछ। अतः हमें इस मामले में अगर कुछ कहना है, तो हमें अपने चरित्र को बचाना है। जैसा मैंने कहा था कि हाथ के महत्व की पैरों के महत्व से तुलना नहीं की जा सकती। उसी प्रकार पुरुष के महत्व की तुलना महिला के महत्व से नहीं की जा सकती। मैं एक बात अवश्य कह सकता हूँ। हमारे शास्त्रों के अनुसार महिलाएँ देवी-लक्ष्मी हैं, हमारे समाज में महिलाओं को लक्ष्मी, सरस्वती, गृहलक्ष्मी भी कहते हैं। वे सब कुछ हैं। यदि मैं पुरुष और महिला की तुलना करूं, तो मैं कह सकता हूँ कि विश्व में पुरुष की तुलना में महिलाएं अधिक महत्वपूर्ण हैं। मैं इसे और स्पष्ट कर सकता हूँ। यदि हम सभी पुरुषों को इस विषय से हटा दें अथवा