86 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
लिए आएगा अथवा सम्पत्ति में भागीदार बनेगा, तब उसका सम्मान नहीं किया जाएगा। प्रत्येक बात को सही प्रकार से विकसित किया जाना चाहिए तथा स्वाभाविक रूप से विकसित किया जाना चाहिए। अतः यदि यह विधिकरण कानून बना दिया जाता है, तो अनेक कठिनाइयां उत्पन्न हो सकती हैं जिससे हमारे देश में विवाद बढ़ जाएंगे तथा शुद्ध प्रेम का सिद्धांत समाप्त हो जाएगा।
इसलिए मैं इस सदन के प्रत्येक सदस्य से अपील करता हूँ कि इस मामले पर शान्तिपूर्वक से विचार करें। जैसा कि इस सदन के कई सदस्यों ने सुझाव दिया है और जैसा कि मैंने पहले कहा है, यह सदन इस विधेयक को कानून बनाने में सक्षम नहीं है। यह कैसी बात है कि वे इतने चिन्तित हैं कि यह विधिकरण आज ही पारित कर दिया जाए। एक या दो वर्ष तक प्रतीक्षा करने का साहस क्यों नहीं है? क्या मैं यह कह सकता हूँ कि वे नए चुनावों से भयभीत हैं?
श्री एल. कृष्णास्वामी भारतीः नहीं, बिल्कुल नहीं।
बाबू रामनारायण सिंहः हिंदू समाज प्राचीन प्रथाओं और अन्य प्रत्येक बात के अनुसार अभी तक जीवित है और सुसम्पन्न है। अतः यदि हम इस विधेयक को परिचालित करें, तो कोई पहाड़ नहीं गिर पड़ेगा, जैसा मेरे मित्र नजीरुद्दीन ने कहा है। मैं सदन के प्रत्येक सदस्य से अपील करता हूँ कि वह इस विधिकरण के बारे में शांत भाव से विचार करें। लोग आगामी चुनाव से भयभीत हो सकते हैं कि कांग्रेस के सदस्यों को मत प्राप्त नहीं होंगे। यह प्रश्न पैदा ही नहीं होता। हमें अपने प्रति, अपने निर्वाचन-क्षेत्र के प्रति और उन लोगों के प्रति निष्ठावान होना चाहिए, जिन्होंने हमें यहां भेजा है।
इसलिए मैं अपनी समस्त शक्ति के बल पर इस विधिकरण का विरोध करता हूँ और अपने मित्र ‘पंडित’ नजीरुद्दीन अहमद के इस प्रस्ताव का समर्थन करता हूँ कि यह विधेयक लोकमत के लिए परिचालित किया जाए।
ऽश्री एस. सिद्दावीरप्पा (मैसूर रियासत)ः मैं माननीय विधि मंत्री को बधाई देता हूँ कि उन्होंने इस प्रस्ताव को प्रस्तुत करते समय अति सरल शब्दों में अपना भाषण दिया। श्रीमान, इस बारे में काफी कुछ कहा गया है कि यह विधिकरण गहरे तक हिंदू समाज को प्रभावित करता है। मैं देश के ऐसे भाग अर्थात् मैसूर से आता हूँ, जहां कुछ सैद्धांतिक बातें इस विधेयक द्वारा प्रारम्भ की जानी हैं, जबकि वे बातें वहां पहले से ही लागू हैं। उदाहरणार्थ, हमने दत्तक कानून और बेटी के हिस्से के संबंध में कानून को अपनाया है। और कई अन्य बातों को भी स्वीकार किया है, जो इस विधेयक में विद्यमान हैं। परन्तु इस बारे में सिद्धांत का निरूपण किया गया है। हमने 1934 में विधेयक बना
ऽसीए. (विधा.) डी., खंड 2, भाग II, 28 फरवरी, 1949, पृष्ठ 953-56