(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 102

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लिया था जिसे हिंदू महिला के अधिकार का विनियम (हिंदू वीमेन्स राइट्स रेग्यूलेशन) कहते हैं और गत चौदह वर्षों से मैसूर में यह विधेयक कानून है। वस्तुतः वहां हमने कोई विशेष उपद्रव नहीं देखा है। वहां न तो मुकदमेबाजी है और न वहां हिंदू समाज का विखंडन है, जैसा कि यहाँ कुछ माननीय सदस्यों ने बताया है। अपने अनुभव के आधार पर वास्तव में, हमने यह समझा है कि ऐसा विधिकरण, जिसकी आवश्यकता है अभी लागू नहीं समझा जाएगा तथा यह देखने के लिए दूसरी समिति का गठन कर लिया गया है कि वर्तमान विधिकरण में विशेष सुधारों की गुंजाइश है।

यह बताया है कि सदन के समक्ष प्रस्तुत विधिकरण हिंदू समाज की जाति प्रथा या अन्य सैद्धान्तिक विश्वासों या सिद्धांतों को प्रभावित करता है। श्रीमान, हिंदू साहित्य का मेरा अपना अध्ययन यह है कि यदि हम वैदिक युग का अध्ययन करें, जो युग 2000-1400 ईसा पूर्व है, और उस समय के मौजूद हिंदू समाज का अध्ययन करें तो हम उस समय हिंदू समाज में इन चार जातियों को नहीं पाते हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपने गुण अपना कर्म के अनुसार जन्म लेता है तथा उसे अपने जीवन में ही सभी वर्णों अथवा आश्रमों में से होकर गुजरना होता था। एक लड़का जब तक वह बीस वर्ष का नहीं हो जाता, अपने परिवार के प्रति कर्तव्यों को निभाता था तथा अपने गुरु की आज्ञा का पालन करता था तथा उन सभी कार्यों को सम्पन्न करता था जो उसे सौंपे गए थे, तब वह ‘शूद्र’ कहलाता था। बीस वर्षों की आयु के बाद उसे विवाह की अनुमति मिल जाती है, तब उसे परिवार के दायित्वों को निभाने की जिम्मेदारी लेनी पड़ती थी तब कर्तव्य के अनुसार जो उसके लिए निर्धारित थे। उसके अनुसार उसे ‘वैश्य’ कहा जाता था। वह अपने जीवन का कुछ समय आनन्द से बिताने के बाद और 40 वर्ष की अथवा इससे कुछ अधिक वर्ष की आयु प्राप्त करने के बाद, जब देश की रक्षा के लिए प्रत्येक पुरुष की आवश्यकता होती थी, तब उसे ‘क्षत्रिय’ के कर्तव्य निभाने पड़ते थे। जब वह विशेष आयु अर्थात् 60 वर्ष की आयु प्राप्त कर लेता है तथा जीवन का अधिक भाग बिता चुकता है, तब उसे अपने अनुभव और विद्धता के कारण अपने शिष्यों का अध्यापन करना पड़ता था तथा अन्य बुद्धिमत्ता के कार्य करने पड़ते थे और तभी उसे ‘बा्रह्मण’ कहा जाता था क्योंकि वह ऐसा व्यक्ति था जिसने ब्राह्मण के गुण प्राप्त कर लिए हैं।

इसलिए इस देश में जातिप्रथा अलग-अलग तरीकों से उत्पन्न हुई है तथा अलग-अलग तरीकों से विकसित हुई है। परन्तु आज हम समझते हैं कि लगभग 13,000 जातियाँ हैं तथा इससे भी अधिक उपजातियां हैं, जिनकी अलग-अलग परम्पराएं हैं, अलग-अलग रिवाज़ हैं तथा और भी बहुत कुछ है।

हमें यह पता है कि जहां तक राजनीतिक एकता का संबंध है हम एक हैं। यदि हम नियमों का एकरूपी मानक चाहते हैं या अपने कानून का एकरूपी मानक चाहते हैं तो ऐसी संहिता होनी चाहिए, जो हमें निश्चित मानक प्रदान करती हो। यदि सोच-विचार