(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 103

88 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

की स्थिति में आवश्यक हो तो हम विचार कर सकते हैं कि कौन-सी धाराएँ आवश्यक हैं और कौन-सी धाराएँ आवश्यक नहीं हैं। परन्तु यदि हम यह कहें कि संहिता की आवश्यकता ही नहीं है तो मैं नहीं सोचता कि हम में से कोई भी, यदि हम समझ का प्रयोग करें तो उस स्थिति को स्वीकार कर सकते हैं। हम देखते हैं कि इस देश में ऐसे लोग हैं, जो विभिन्न प्रकार के विश्वास, यथा द्वैत और अद्वैत मानते हैं। ऐसे भी लोग हैं जो एक पत्नीत्व और बहुपत्नीत्व को मानते हैं और कुछ स्थानों में बहुपतित्व की प्रथा भी प्रचलित है।

इन परिस्थितियों के अंतर्गत क्या यह हमारे लिए आवश्यक नहीं कि हम देखें कि उत्तराधिकार, विवाह और कई अन्य बातों के प्रयोजनों के लिए एक समान संहिता प्राप्त हो। ब्रिटिश सत्ताधिकारियों के समय में हमने देखा कि धार्मिक तटस्थता के भेष में अथवा हस्तक्षेपहीन स्थिति में उन्होंने यह देखने की चिंता नहीं की कि हिंदू समाज के कौन-से दोष मिटे हैं। पर उन्होंने इस दिशा में कोई सुधार लाने का प्रयत्न नहीं किया। वास्तव में, जब वर्क द्वारा वारेनेहेस्टिंग की निंदा की गई थी तब यह कहा गया था कि उसके विरुद्ध लगाए गए अभियोगों में से एक अभियोग यह था कि उसने अपने व्यक्तिगत प्रशंसा के प्रयोजन के लिए जाति-सूचकों का उपभोग किया था। ब्रिटिश सत्ताधारियों ने यह देखा कि जाति-प्रथा उनके अपने लाभ के लिए ही उपयुक्त थी, अतएव उन्होंने कभी भी समाज में सुधारों की आवश्यकताओं के बारे में न सोचा और न कभी हस्तक्षेप किया। परन्तु आज ऐसा कोई कारण नहीं है कि जब हम स्वतंत्र हैं, तो हम अधिक वांछित सुधार लाने का उद्देश्य न अपनाएँ। किसी ने कहा है कि हम आगे बढ़ रहे हैं। हमें यह विधिकरण इतनी शीघ्रता से क्यों लाना चाहिए और हमें कुछ समय के लिए प्रतीक्षा क्यों नहीं करनी चाहिए? मेरा तर्क है कि इस सुधार को बहुत पहले किया जाना चाहिए था, क्योंकि यह काफी समय से लंबित था। किंतु यह भी तथ्य है कि हमारा देश परतंत्र था और हम अपने भाग्य के विधाता नहीं थे। अतः मेरा निवेदन है कि यह दिन जल्दी नहीं आया है।

इस सदन की क्षमता आदि से संबंधित कई अन्य आपत्तियाँ भी उठाई गईं। वास्तव में माननीय विद्वान प्रस्तावक ने यह स्पष्ट उल्लेख किया है कि हम इस वांछनीय फल को प्राप्त करने के लिए कहां तक सक्षम हैं। इसलिए अब मैं इस सदन का अधिक समय नहीं लेना चाहता, क्योंकि कई वक्ता भाषण देने की प्रतीक्षा में हैं।

जहाँ तक तलाक के सिद्धांत का संबंध है, मेरा यह मत है कि यह विषय है जिसके बारे में वर्तमान हिंदू समाज के अनेक लोगों में उत्तेजना है, चाहे वह सांस्कारिक विवाह हो अथवा किसी अन्य प्रकार का विवाह हो, मैं यह देखना नहीं चाहता कि किसी भी परिस्थिति में विवाह का अविच्छेदनीय बंधन बना रहे। इसकी बजाय लोगों को उन्मुक्त विवेक दिया जाए। मैं माननीय प्रस्तावक से निवेदन करूंगा कि वे इस विषय पर विचार