90 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
अधिकांशतया कृषि से संबंधित है और इस तथ्य की दृष्टि से कि नब्बे प्रतिशत लोगों की सम्पत्ति इस अधिनियम के लागू किए जाने की परिधि से बाहर रखी जाएगी, मेरा विश्वास है कि इस भू-सम्पत्ति को टुकड़ों में विभाजित करने का सिद्धांत तर्कसम्मत नहीं है।
जहां तक रिवाज़ का संबंध है इस बारे में मेरे कुछ मित्रों ने निवेदन किया था कि रिवाज कानून से ऊपर हो जाता है अतः कानून की शक्ति से प्रभावित रिवाज़ को स्वीकार किया जाना चाहिए। मेरे विचार में हम में से कई जिन्हें अधिवक्ताओं का अनुभव है, आसानी से यह देख सकते हैं कि कैसे रिवाज़, सुविधानुसार उदार कानून के प्रभाव को समाप्त कर देता है। मैं एक उदाहरण दे सकता हूँ। भारतीय दण्ड संहिता में एक उपबंध है, जिसके अंतर्गत कोई भी लड़की अनैतिक प्रयोजन के लिए समर्पित है तो वह अपराध है। इस समर्पण के चिह्नस्वरूप लड़की के गले में कुछ मोती बांध दिए जाते हैं। अब अधिवक्ता की पटुता इस बात में निहित थी कि वह लड़की के गले में मोतियों की माला पहनाने के रिवाज़ का अविष्कार किया और उस रिवाज़ को ऐसे मामलों में भी लागू कराया जहां अनैतिक प्रयोजनों के लिए समर्पण किया गया था। इसके अलावा, हम यह भी जानते हैं कि रिवाज़ों के कारण मुकदमेबाजी कैसे होती है और इसमें प्रचुर धन व्यय किया जाता है, जैसाकि पिछले शासन के अंतर्गत भी किया जाता था। लोग किसी विशेष बात पर निर्णय पाने के लिए प्रचुर धन व्यय करते थे और दो अलग-अलग निर्णयों के बीच मतभेद कराने के लिए न्यायाधीशों पर अधिक धन व्यय करते थे। आज यह विधेयक इतना सरल है, इतना सुबोध है कि किसी अधिवक्ता की आवश्यकता नहीं होगी और कोई भी व्यक्ति चार आने में ही इस बात को जान सकेगा कि उसकी इस कानून के अंतर्गत क्या स्थिति है।
पंडित लक्ष्मीकांत मैत्रेयः क्या आपका अभिप्राय यह है कि वह चार आने में ही सब कुछ कर सकता है।
श्री एच. सिद्दावीरप्पाः यह नितांत संभव है और एक दिन ऐसा आएगा। हम इसके लिए भी प्रयत्न करेंगे। वस्तुतः हम यह देख रहे हैं कि यह न्यायिक निर्णय कुछ सम्पत्ति-अधिकारों और अन्य विषयों को किस प्रकार प्रभावित करते हैं। एक न्यायाधीश एक निर्णय देता है और वह निर्णय कुछ समय तक कानून बना रहता है। कल कुछ लोग अन्य कानून देखेंगे, कुछ पाठ्य अथवा स्मृति अथवा कुछ पुराने दस्तावेज होंगे और हमें बताया जाएगा कि यह कानून रद्द कर दिया गया है, जिसका परिणाम यह हुआ है कि हिंदू कानून में कुछ भी स्थिर नहीं है। वस्तुतः हम ब्रिटिश सत्ता के अधीन गत 150 वर्षों से देख रहे हैं। एक निर्णय के बाद कई दूसरे निर्णय हो चुके हैं और वे कह रहे हैं कि हिंदू कानून में कुछ स्थिर नहीं है। मैं यह पूछना चाहता हूँ कि हम कानून का स्थिर रूप कब पा सकेंगे जिससे साधारण व्यक्ति यह समझ सके कि वास्तव में उसकी स्थिति क्या है। वास्तव में जब कोई ऋणदाता धन उधार देना चाहता है तो वह इस बात से संतुष्ट होना चाहता है कि उसके उत्तराधिकारी कौन हैं, जिनके उसकी सम्पत्ति में