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भाग हैं और जिसके फलस्वरूप उसकी कृषि भूमि, जिसके आधार पर उसे एक हजार रुपये का ऋण दिया जा सकता है। वह उसे 500 रुपये या इससे कुछ अधिक ही धन उधार देता है। इसलिए किसी भी दृष्टि से मैं इसे एक स्वस्थ विधिकरण मानता हूँ और मैं इस विधेयक का अपने हृदय से समर्थन करता हूँ।
माननीय अध्यक्षः यह बहस कल प्रश्नोत्तर अवधि के बाद जारी रहेगी।
ऽहिंदू संहिताµजारी
ऽऽश्रीमती जी. दुर्गाबाई (मद्रासः सामान्य)ः यह अत्यंत प्रसन्नता का विषय है कि मैं माननीय विधि मंत्री द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव के समर्थन में बोलने के लिए खड़ी हूँ। मैं यह भी महसूस करती हूँ कि मैं श्री वी.एन. राउ और समिति के अन्य सहयोगियों के प्रति गहन आभार व्यक्त करूं जिन्होंने इस रिपोर्ट को तैयार करने में महान परिश्रम किया है और जो इस विधेयक का आधार है।
यह विधेयक हिंदू कानून को संहिताबद्ध करने के लिए है और जब यह एक पुस्तक का रूप लेगा तो यह इस देश के सामाजिक इतिहास में महान सफलता का चिह्न माना जाएगा। इसे पूर्व कि मैं इस विधेयक के मुख्य उपबंधों के बारे में अधिक विस्तार से कुछ कहूँ, मैं एक विषय पर बल देना चाहूँगी। माननीय सदस्य इस तथ्य से अवगत हैं कि इस विधेयक के उपबंध अनुज्ञेय अथवा समर्थनीय प्रकार के हैं। वे हिंदुओं के दकियानूसी वर्गों पर भी किसी भी प्रकार का दायित्व/दबाव आरोपित नहीं करते। उनका प्रभाव केवल यह है कि विकसित और ऊंचा उठने वाले हिंदुओं, पुरुषों और महिलाओं को जीवन जीने के लिए स्वतंत्रता दी जाए और वह स्वतंत्रता उनके पुराने तरीकों को अपनाए रहने की उनकी स्थिति को प्रभावित अथवा वि शृंखलित किए बिना जारी रह सके।
मैं अपनी टिप्पणियों को एक या दो मुख्य आपत्तियों तक ही सीमित रखना चाहती हूँ जो इस विधेयक के विरोध में उठाई गई हैं। पहली आपत्ति इसे संहिता-बद्ध किए जाने के विरोध में हैं। उसमें इस बात पर दिया जाता है कि हिंदू कानून के कई सिद्धांत अब सुस्थिर हो चुके हैं, और सुस्थिर नियमों को अस्थिर करने अब इस संहिता (कोड) की बिल्कुल आवश्यकता नहीं है। दूसरी आपत्ति यह है कि एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को सौंपे गए हिंदू कानून के सिद्धांतों को सुरक्षित रखने की बजाए इसे संहिताबद्ध किए जाने का प्रयत्न ऐसे सिद्धांतों को प्रारम्भ करेगा जो हिंदू समाज के लिए बिल्कुल अपरिचित हैं। यह कहा गया है कि विधानमंडल को स्मृतियों, श्रुतियों और सुप्रसिद्ध ऋषियों के आदेशों को बदलने का कोई अधिकार नहीं है। हिंदू संहिता विधेयक के विरुद्ध अन्य
ऽसीए. (विधा.) डी., खंड 2, भाग II, 2 मार्च, 1949, पृष्ठ 991-1030
ऽऽवही, पृष्ठ 991-95