(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 107

92 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

आरोप यह है कि क्रांतिकारी प्रकार के परिवर्तन प्रारंभ किए गए हैं, अतः स्मृतियों और धर्म द्वारा तैयार किया गया कानून नष्ट हो जाएगा। इन तमाम आपत्तियों के संबंध में मेरा उत्तर है कि यह बात इसलिए है कि हिंदू कानून के कई सिद्धांत अब सुस्थिर हैं। इन सभी सिद्धांतों को विधिवत और आसानी से समझने वाली संहिता में आबद्ध करने का प्रयत्न किया जाना चाहिए।

आज हिंदू कानून जिस स्थिति में है वह बिना किसी निश्चितता के कठोर है। उसमें कई न्यायिक निर्णय और पूर्व निर्णय अपनी उपयोगिता खो बैठे हैं। एक अंग्रेजी लेखक ने लिखा है कि इस विषय पर वाद संबंधी कानून एक गहन जंगल हो गया है। जहां वृक्षों की लकड़ी देख पाना भी संभव नहीं है। अलग-अलग उच्च न्यायालयों ने समय-समय पर जो निर्णय किए हैं, वे परस्पर विरोधी निर्णय हैं। यहां तक प्रिवी काउंसिल द्वारा कानून के पेचीदा प्रश्नों पर दिए गए निर्णयों से ऐसा लगता है कि व्यापक रूप से वे निर्णय प्राचीन प्राधिकरण तथा आधुनिक भावना दोनों से मेल नहीं खाते। एकरूपता तथा एकीकृत कानून हिंदू समाज के लिए वरदान सिद्ध होगा, क्योंकि इससे कानून के विद्यार्थियों तथा अधिवक्ता दोनों का काफी समय बचेगा जो अन्यथा इस कार्य में कई वर्ष लगा देते हैं, ताकि वे कानून को पूरी तरह समझ सकें। यहां तक कि साधारण नागरिक इस संहिता को पढ़ने में सक्षम होगा और स्वयं कहेगाµफ्इस पुस्तक में मेरे अधिकारों, विशेषाधिकारों और दायित्वों के मूल आधार दिए गए हैं।य् वह संहिता न्यायाधीशों का समय और भ्रम बचाएगी तथा इससे न्याय को शीघ्रता से लागू किया जा सकेगा। मेरी राय में ‘संहिता (कोड) के बिना रहना, न्याय के बिना रहना है।’

यह आपत्ति कि इस संहिता ने क्रान्तिकारी परिवर्तन प्रारंभ कर दिए हैं, कुछ स्वार्थी तत्वों ने उठाई है। देश के भावी हितों की सुरक्षा के लिए कुछ वर्तमान हितों के दमन का सदैव स्वागत किया जाना चाहिए। वस्तुतः यह संहिता उस दिशा में काफी दूर नहीं जाती और यही मेरा मत भी है।

अधिकांश कृषि-सम्पत्ति को इस संहिता के अधिकार के बाहर रखा गया है। इसलिए इस बात पर बल दिया गया है कि आपका उद्देश्य कि एकरूपता वाला कानून अपनाया जाए। इसी दिशा में हतोत्साह करने वाली ऐसी संहिता क्यों बनाई जाए जिसका उद्देश्य

खत्म हो जाए? इस आपत्ति पर मेरा उत्तर यह है, इस संहिता का उद्देश्य है कि सभी हिंदुओं के लिए एक समान कानून हो परन्तु यह आवश्यक नहीं है कि सभी प्रकार की सम्पत्ति के लिए एक समान कानून हो। कृषि के हित में भी, यदि कोई अन्य विषय न हो, अलग-अलग कानून तथा विशेष प्रकार के कानून उपयुक्त विधानसभाओं द्वारा पारित किए जाएंगे, जिनमें उत्तराधिकार से संबंधित विशेष कानून भी होगा। वह कानून उत्तराधिकार के कानून से अलग होगा। जो अन्य प्रकार की सम्पत्ति पर लागू होता है।