(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 108

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अब मैं इस बात का उल्लेख करूंगी कि मुख्य आपत्ति क्या है, अर्थात् बेटी को सम्पत्ति में हिस्सेदारी। इसका कई आधारों पर विरोध किया गया कि इससे सम्पत्ति का बिखराव और टुकड़ों-टुकड़ों में बंटना हो जाएगा तथा दामाद के रूप में एक विदेशी तत्व का प्रवेश जैसा होगा। इस आपत्ति का एक आधार यह भी है कि बेटी के साथ बेटे का एक जैसा उत्तराधिकार हिंदू समाज को भी तोड़ देगा। यह भी कहा जाता है कि यदि बेटी अपने भाग को ले लेती है, तो उसका भाईयों के प्रति प्रेम समाप्त हो जाता है। यह भी कहा गया है कि कई परिवारों में बेटे, विवाह के व्यय तथा उत्तराधिकार के भाग के दुगने भार से नष्ट हो जाएंगे और बेटी के हिस्से से भी। क्या मैं यह पूछ सकती हूँ कि भाइयों का यह कैसा प्रेम है जिसमें अपने ही हित पर अधिक बल दिया जाए? क्या मैं पूछ सकती हूँ कि यदि बेटी को कोई भी भाग न दिया जाए, तो भाइयों का प्रेम बढ़ जाएगा?

जहां तक विभाजन का संबंध है, मैं यह समझने में असमर्थ हूँ कि यह प्रश्न किस प्रकार उठाया जाए क्योंकि यह पहले ही कहा गया है कि इस विधेयक के क्षेत्र से कृषि-सम्पत्ति को अलग कर दिया गया है। इस सदन के माननीय सदस्यों में से एक सदस्य ने यह बात उठाई थी और हम सभी इस बात से अवगत हैं कि अधिकांश कृषि-सम्पत्ति इस संहिता की परिधि से बाहर निकाल दी गई है। यह संहिता शहरी और चल सम्पत्ति पर ही लागू की जाएगी। तब विभाजन से क्या अभिप्राय है? मैं महसूस करती हूँ कि उस भाग को कम करना है, जो उन्हें प्राप्त होगा, यदि बेटी को भी इसमें भाग दिया जाता है। जब बेटी भी उसी शरीर से उत्पन्न हुई है, तो इतना हंगामा क्यों है? मैं पूछना चाहती हूँ कि उसे भी उसका भाग क्यों नहीं दिया जा सकता?

यदि कोई अजनबी व्यक्ति भी परिवार में सम्मिलित हो जाता है, तो ऐसी स्थिति में मेरा उत्तर यह है कि जिस सम्पत्ति को बेटी अपने पिता से लेती है, यदि आवश्यक हो तो उस अलग सम्पत्ति के लिए भी कानून बनाया जाना चाहिए। कानून उपबंध के बुरे या भले परिणाम भी उस विशेष व्यक्ति अर्थात् संबंधित दामाद पर निर्भर करते हैं। मैं इसके बारे में अधिक नहीं कहना चाहती।

इस बात पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि यदि बेटी, बेटों के समान अपना भाग मांगती है, यदि आवश्यकता हो तो वह पिता की मृत्यु के बाद ऐसा कर सकती है। यह प्रश्न ही नहीं है, उसके अपने हिस्से की मांग करने की यदि पिता जीवित है। इसलिए मैं नहीं समझ पा रही कि कुछ माननीय सदस्य उस पर आपत्ति क्यों उठा रहे हैं। चूंकि विधि मंत्री ने पहले ही इस मामले को स्पष्ट कर दिया है और स्मृतियों ने भी बेटी के लिए पिता की सम्पत्ति में भाग लेने को मान्यता दे दी है, इसलिए इसके बारे में कुछ भी क्रान्तिकारी नहीं है। अस्तु, बेटी को इस आधार पर अलग करना अन्याय और अनुचित है कि वह अपने पिता या पुरखों के आध्यात्मिक लाभों के निमित्त कोई अंशदान नहीं करती।