(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 109

94 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

इस बारे में दलील दी जाती है कि बेटी को अपने पति की सम्पत्ति में भाग क्यों नहीं लेना चाहिए और अपने पिता की सम्पत्ति में भाग लेने के लिए क्यों आना चाहिए? यह एक समझौतावादी सूत्र लगता है। मैं कह सकती हूँ कि यह समझौतावादी सूत्र महिलाओं को स्वीकार नहीं है अथवा स्वीकार्य नहीं होगा। हम कहते हैं कि हमें समानता के आधार पर मान्यता दी जानी चाहिए। यह संहिता प्रस्ताव करती है, भेद खत्म करने का जो वर्तमान में है लिंग के आधार पर और जिसे हटा दिया जाना चाहिए। बेटी को उत्तराधिकारी के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए और उसे बेटी तथा पिता के उत्तराधिकारी के रूप में अपनी सम्पत्ति का भरपूर लाभ मिलना चाहिए। जहां तक विभाजन का प्रश्न है, मैंने इस विषय का पहले ही समाधान कर दिया है। इस दोष को अलग-अलग तरीकों से दूर किया जा सकता है। विभाजन को रोका जा सकता है तथा विशेष कानून द्वारा चकबंदी की जा सकती है। यदि सम्पत्ति का किसी सीमा तक विघटन हो जाता है, तो वह सम्पत्ति बेची जा सकती है और हिस्से को समयोजित किया जा सकता है। ऐसे अलग-अलग तरीके हैं, जिनसे इस समस्या का समाधान हो सकता है तथा इस संबंध में दलील आगे नहीं बढ़ाई जा सकती कि बेटी को अपना भाग नहीं मिलना चाहिए। इसलिए प्रवर समिति ने यह सिफारिश की है जो समानता के सिद्धांत पर आधारित है कि बेटी को बेटे के समान हिस्सा मिलना चाहिए। मैं सदन के माननीय सदस्यों से यह अपील करना चाहूँगी कि इस संबंध में प्रवर समिति ने व्यावहारिक रूप से एकमत होकर जो सिफारिश की है, उसका समर्थन किया जाए।ख्...,

श्री एच.वी. कामथ (सी.पी. और बरारः सामान्य)ः डॉ. अम्बेडकर इस बारे में सहानुभूति नहीं रखते।

श्रीमती जी. दुर्गावाईः इसलिए जब यह कहा जाता है कि बेटी अपने पिता और पति दोनों से ही अपना हिस्सा लेती है तथा पति कुछ भी नहीं लेता, यह कैसे हो जाता है? प्रवर समिति ने यह सिफारिश की है कि पुरुष अपनी पत्नी की सम्पत्ति में उसी प्रकार हिस्सा लेना चाहिए जैसे पत्नी अपने पति की सम्पत्ति में उत्तराधिकारी होती है और बेटे को भी अपनी मां की सम्पत्ति में बराबर का हिस्सा मिलना चाहिए जैसे बेटी की मां की सम्पत्ति में, जैसे बेटी अपने पिता की सम्पत्ति के हिस्से का दावा करती है। इसलिए इस संबंध में उन लोगों को भी कठिनाई नहीं होनी चाहिए, जो इन आधारों पर इस विधेयक का विरोध करते हैं, उनके लिए उत्तर दे दिया गया है। मैं अन्य बातों को उद्धृत नहीं करना चाहूँगी, क्योंकि समय सीमित है और अन्य सदस्य बोलने के लिए आतुर हैं। ( माननीय सदस्यगणः बोलते रहिए। अपना समय लीजिए।) श्री वी.वी. श्रीनिवास आयंगर ने इस संबंध में संकेत दिया कि जो लोग धार्मिक आधार पर इस विधेयक का विरोध करते हैं, वे ऐसी गलतफहमी में रह रहे हैं कि हिंदू कानून मनु के समय से ही स्थिर हो चुका है। स्थिति ऐसी नहीं है।