96 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
महिला को साक्ष्य देते हुए देखा है कि वह इस बात का उत्तर देने के लिए कितनी योग्य और प्रभावशील है। उसने कहा कि एक पत्नीत्व का नियम लागू नहीं किया जाता है, तो यह हो सकता है कि महिलाएं ईसाई हो जाएँ, ताकि वे एक पत्नीत्व का लाभ उठा सकें। परन्तु इसमें कोई भी गंभीर नहीं है।
श्री बी. दास (उड़ीसाः सामान्य)ः क्या आप सोचती हैं कि ईसाई महिलाएँ हिंदू महिलाओं से अधिक प्रसन्न हैं?
श्रीमती जी. दुर्गाबाईः जैसा कि माननीय विधि मंत्री ने पहले ही कहा है कि विश्व भर में प्रचलित विचारों और प्रथाओं का असर यहां भी है और वे विवाह एक पत्नी के पक्ष में है। अतः मुझे इस मामले में अधिक कहने की आवश्यकता नहीं है।
न तो मेरे पास समय है और न यह वांछनीय है कि मैं अब इस विधेयक के अन्य पक्षों पर विचार करूं क्योंकि अन्य सदस्य हैं जो विवाह और तलाक जैसे विषयों पर विचार करेंगे। परन्तु मैं केवल सह-समांशिता के बारे में कुछ कहना चाहूँगी। समीक्षकों और उनके भाष्यकारों द्वारा प्रस्तुत विभिन्न प्रकार के भाष्यों के फलस्वरूप ‘मिताक्षर’ और ‘दायभाग’ में विशिष्टता समक्ष आई है। सैद्धांतिक रूप से संयुक्त परिवार का आधार दोनों में ही आया है। ‘मिताक्षर’ में जन्म द्वारा अधिकार और उतरजीविता के सिद्धांत विशेष लक्षण है। दायभाग पद्धति वास्तविक अनुभव की दृष्टि से अधिक संतोषजनक रही है, इसलिए यह विधेयक उत्तराधिकार की ‘मिताक्षर पद्धति’ को ‘दायभाग पद्धति’ में बदलने के लिए है। यह कहा जाता है कि बंगाल में लोगों की अधिक समृद्धि और उनके बढ़ते हुए वाणिज्यिक उद्यम उनके अधिक क्षेत्रों में व्याप्त ‘दायभाग पद्धति’ के कारण हैं। मुझे बताया गया है कि मद्रास में नट्टूकोट्टाई चेट्टीयार के वाणिज्यिक उद्यम परिवारों के कानूनी संबंधों के कारण अधिक हैं जो ब्राह्मणों के संयुक्त परिवारों की तुलना में सहभागिता के अधिक समीप हैं।
इस विषय पर विशद् चर्चा हो चुकी है, अतः इस पर मैं अधिक परिश्रम नहीं करना चाहती। मैं महसूस करती हूँ कि विरोध ज्यादा है उनके प्राचीन संस्था के प्रति प्रेम के कारण। परन्तु जो लोग इसका विरोध करते हैं, मेरे विचार से वे विरोध करें क्योंकि वे इस तथ्य को भूल गए हैं कि उन मामलों पर हिंदू कानून और धर्म पूर्ववत जड़ हैं और कोई परिवर्तन नहीं किए गए हैं। इस पद्धति में समय-समय पर अलग न्यायिक निर्णयों ने परिवर्तन किए हैं और यह संस्था केवल अपने ही चरित्र से रही है। इस बात का उत्तर महान अधिवक्ता एस. श्रीनिवास आयंगर ने पूरी योग्यता से दिया है। उन्होंने कहा था कि हिंदू कानून जैसे कि प्रिवी कौंसिल ने व्याख्या की है, किसी सदस्य द्वारा किसी भी समय परिवार से अलग होने के अपने इरादे की एक पक्षीय घोषणा से एकता को भंग किया जा सकता है। यह बात सह-समांशिता को भंग करने अथवा ‘मिताक्षर’ को ‘दायभाग’ के रूप में बदलने के अभियोग का उत्तर देने के लिए बिल्कुल पर्याप्त है।