(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 112

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मैं सदन का अब और अधिक समय नहीं लेना चाहती। स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद कई घटनाएं घट चुकी हैं और भारत अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में भाग लेने लगा है तथा मानव अधिकारों के लिए वकालत कर रहा है। साथ ही विदेशों में भारतीयों के साथ समान व्यवहार करने के लिए भी दलील दे रहा है। यह अत्यधिक दुर्भाग्यपूर्ण होगा यदि इस अवस्था में अपने देश की सीमाओं में ही हम हिंदू संहिता का कानन बनाने में असफल रह जाएं। इससे कोई भेद-भाव नहीं होगा और पुरुषों तथा महिलाओं के लिए समानता होगी, यहां से वहां जाने, विकास करने तथा हमारे भारत के पुनर्निमाण में योगदान देने। हमारा संविधान निर्माणाधीन है, हमने पहले ही सैद्धांतिक अधिकारों के सिद्धांत को स्वीकार कर दिया है तथा कानून के सामने प्रत्येक व्यक्ति की समानता के सिद्धांत को स्वीकार कर लिया है। हमने इस उपबंध को भी पारित कर दिया है जो हमें समान सिविल संहिता तैयार करने में समर्थ करता है। इसलिए मैं आपसे यह अपील करती हूँ। हमें अपने लिए हिंदू कानून-संहिता को स्वीकार करने में कमी या देरी नहीं करनी चाहिए, जो हमारे समाज के लिए उस मार्ग में विशेष वरदान सिद्ध होगी, जिसके बारे में मैंने पहले ही बताया दिया है।

ऽपंडित लक्ष्मीकान्त मैत्रेय (पश्चिम बंगालः सामान्य)ः श्रीमान, मैं आपको धन्यवाद देता हूँ कि आपने कृपापूर्वक कुछ शब्द व्यक्त करने का मुझे अवसर प्रदान किया है कि मैं इस सदन के समक्ष विचारार्थ प्रस्ताव के बारे में क्या महसूस करता हूँ अर्थात् हिंदू संहिता पर क्या विचार रखता हूँ। मैं जानता हूँ कि मैं अधिक लाभकारी स्थिति में नहीं हूँ, क्योंकि मैं प्रथम दो दिन सदन में उपस्थित न हो सका, जब इस प्रस्ताव पर बहस की गई थी, क्योंकि मैं यहाँ से बाहर गया हुआा था।

अब मैं अपने व्यस्त कार्यों से भी कुछ समय निकाल सका, जब मैंने प्रेस की रिपोर्टें देखीं और यह ज्ञात किया कि मेरे माननीय मित्र विधि मंत्री डॉ. अम्बेडकर ने अपने प्रस्ताव के समर्थन में शानदार भाषण दिया है। उतना ही सशक्त भाषण, मैं कोई तुलना नहीं कर रहा, मैं रिपोर्टों के आधार पर कह रहा हूँ, और रिपोर्टरों ने अपने-अपने मतानुसार अलग-अलग विचार व्यक्त किए हैं, पंडित ठाकुर दास भार्गव ने भी सशक्त भाषण दिया है।

मैंने पूरे ध्यान से प्रस्ताव के पक्ष में चार भाषण और विपक्ष में एक भाषण सुना है। जब कल सदन में बहस हो रही थी तब मैंने सदन के सदस्यों की रुचि समझी, कभी-कभी उन्हें प्रसन्न मुद्रा में भी देखा, परन्तु जब कोई सदस्य विधेयक के मुख्य उपबंधों के विरोध में होता तो सभी प्रकार के ताने और उपहासजनक शब्द भी गूंजते रहे। ( माननीय सदस्यगणः नहीं, नहीं।) मैं प्रसन्न हूँ कि ऐसा नहीं हुआ। मेरा विचार है कि इससे मुझे प्रोत्साहन मिलेगा क्योंकि अधिकांश सदस्य यह जानते हैं, मेरे विचार से प्रत्येक

ऽसीए. (विधि.) डी., खंड 2, भाग II, 1 मार्च, 1949, पृष्ठ 995-1015