98 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
सदस्य जानता है, मुझे किस पक्ष में भाषण देना है। मैं नहीं जानता कि मुझे इस प्रकार की ‘कुख्याति’ कैसे प्राप्त हुई। मैं इसे प्रसिद्धि नहीं कह सकता। बहरहाल, मैं इस विधेयक के उपबंधों को समर्थन नहीं देता। मैं इस बारे में कोई भी गोपनीयता नहीं रखूंगा ( एक माननीय सदस्यः आपको ऐसा क्यों करना चाहिए?) क्योंकि मैं अपनी दृढ़ धारणा को व्यक्त करूंगा। मैं जानता हूँ कि इस सदन को संबोधित करना मेरे लिए कितना नाजुक कार्य है। कैसे इसका गठन हुआ और मैं देख रहा हूँ कि इसकी रुचि क्या है। मैं जानता हूँ कि मुझे इस दुस्साहस के लिए पश्चाताप करना पड़ेगा, पर मैंने इस सदन को संबोधित करने का साहस जुटा लिया है, और मैं वही कहूँगा जो मैं महसूस करता हूँ। यह मेरे लिए मददगार होगा कि सम्बोधन से पूर्व मुझे मेरी माननीय बहन श्रीमती दुर्गाबाई को सुनने का अवसर मिला, जिन्होंने बिल के समर्थन में अति तर्कसंगत भाषण दिया है।
मैं अपनी बहन से क्षमा चाहता हूँ कि मैं उनके सिद्धांतों से सहमत नहीं हूँ, यद्यपि उन्होंने विश्वासपूर्वक मान लिया है कि सभी सदस्य उन्हें स्वीकार कर लेंगे। उन्होंने एक निष्कर्ष देकर अपना भाषण समाप्त किया तथा सदन से अपील की कि संविधान के मसौदे में ऐसे सिद्धांतों को प्रभावी बनाया जाए जिससे कानून की दृष्टि से सभी को समानता उपलब्ध हो। जी हां, हमने ऐसा ही किया है। उन्होंने हमें यह भी याद दिलाया कि हमने अपने संविधान में ऐसे निर्देशक सिद्धांत पारित कर दिए हैं, जिनमें से एक निर्देशक सिद्धांत के अनुसार उस देश के लिए एक समान सिविल संहिता होनी चाहिए। मुझे प्रसन्नता है कि उन्होंने आज मुझे भाषण प्रारंभ करने के लिए शुरुआती बिंदु दे दिया है। जब इस विषय पर कुछ महीने पूर्व किसी अन्य स्थान पर बहस की गई थी तथा उसके बारे में अनौपचारिक रूप से विशद् विवेचन किया गया था, मैंने इस उपबंध के विरुद्ध जोरदार ढंग से विरोध दर्ज किया था। जैसा कि मैंने महसूस किया था, मैंने कहा था कि यह कुछ भी नहीं है अपितु दकियानूसी विश्वास और नारेबाजी है। सभी प्रकार के धर्मों या विश्वासों वाले 32 से 34 करोड़ की आबादी वाले देश के लिए समान सिविल संहिता क्यों हो जबकि इस देश में ईसाई धर्म विद्यमान है। मैंने संशोधन प्रस्तुत किया कि व्यक्तिगत कानून सुरक्षित होना चाहिए और विधेयक वैयक्तिक कानूनों में राज्य की ओर से दखलंदाजी है, जिसके लिए देश को कानून बनाने का कोई अधिकार नहीं है।
मौलाना हसरत मोहानी (यू.पी.ः मुस्लिम)ः वाह, वाह!
श्रीमती रेणुका रे (पश्चिम बंगालः सामान्य)ः यही वह कारण है कि आपको हिंदू संहिता का समर्थन करना चाहिए।
पंडित लक्ष्मीकांत मैत्रेयः माननीय बहन मेरे सामने यह कहती हैं कि यही कारण है जिसके फलस्वरूप मुझे हिंदू संहिता का समर्थन करना चाहिए। क्या मैं यह कह सकता हूँ कि यही वह कारण है जिसके फलस्वरूप मैं हिंदू संहिता का विरोध कर