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लिए एक समान सिविल संहिता के सिद्धांतों को स्वीकृत करने में आपकी निष्ठा नहीं है। अन्यथा, आप इसे दो महीने के भीतर कैसे तैयार कर सकते हैं? केवल जिसे हिंदुओं, सिखों, जैनियों और बौद्ध धर्मानुयायियों को शासित करना है।
श्रीमती रेणका रेः हिंदू संहिता काफी पहले से आ चुकी थी।
पंडित लक्ष्मीकांत मैत्रेयः आपने ईसाई, मुस्लिम, पारसी को क्यों छोड़ दिया है?
मौलाना हसरत मोहानीः मुस्लिम अपने वैयक्तिक कानून में हस्तक्षेप कभी भी स्वीकार नहीं करेंगे।
पंडित लक्ष्मीकांत मैत्रेयः आपको मुझे याद दिलाने की आवश्यकता नहीं है, मैं यह जानता हूँ। मैं पूर्ण रूप से अपने माननीय मित्र मौलाना हसरत मोहानी के प्रस्तावना का आदर करता हूँ। परन्तु सदैव मैं सोचता हूँ कि यह संविधान के स्वीकृत सिद्धांतों से सैद्धान्तिक रूप से अलगाव है।
जब मेरी माननीय मित्र श्रीमती दुर्गाबाई ने कहा कि संहिताकरण न्यायसंगत है, तो उन्होंने यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि संहिता-बद्ध कार्य के लिए बाधा रहित मामला तैयार कर लिया गया था। अपनी बहन श्रीमती दुर्गाबाई के प्रति आदर व्यक्त करते हुए मैं यह निवेदन करता हूँ कि मैं इससे असहमत हूँ। मैं संहिता बनाने की आवश्यकता समझ सकता हूँ, जब कानून असमंजस की स्थिति में हो अथवा मतों में अधिक विविधता हो या काफी अस्पष्टता या अनिश्चितता हो। ऐसी दशा में संहिता बनाने का कार्य देश के सर्वोत्तम विधि विशेषज्ञों द्वारा किया जाना चाहिए, जो एक साथ बैठकर कानून के उन विभिन्न सिद्धांतों का प्रारुप तैयार कर सकें, जो इस समय भ्रामक अथवा अनिश्चित स्थिति में हैं। क्या हिंदू कानून के संबंध में इस देश में ऐसी स्थिति है?
श्री कृष्ण चन्द्र शर्मा (यू.पी.ः सामान्य)ः ऐसा ही है।
पंडित लक्ष्मीकांत मैत्रेयः मैं आपका वक्तव्य स्वीकार करता हूँ। परन्तु मैं अत्यधिक
खेद महसूस करता हूँ कि आपने हिंदू कानून के बारे में विशाल अनभिज्ञता प्रदर्शित की है। यदि मेरे माननीय मित्र अधिवक्ता हैं, और यह उनका विचार है, जो उन्होंने अच्छी वकालत नहीं की है। वह कृपापूर्वक इस मित्रवत प्रत्युत्तर को क्षमा करें। मैं हस्तक्षेप सहन कर सकता हूँ। यदि आप हस्तक्षेप करते हैं, तो आप मेरे भाषण में अदरक का स्वाद मिला देते हैं। इस देश में ब्रिटिशों के आने के बाद, हिंदू कानून को शनै-शनैः क्रिस्त्लीकरण हुआ है। पर उन्होंने देश के लोगों के वैयक्तिक कानून को छूने का साहस नहीं किया।
बाबू रामनारायण सिंहः वे महिलाओं के लिए सीमित सम्पत्ति के पक्षधर थे।