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विस्तृत है। जिसमें हिंदू समाज के जीवन और आचार को नियमित करने का प्रावधान पिछले सत्र के अन्तिम दिन प्रस्तुत किया गया था और उस दिन के कार्य के अन्त में हम पांच बजे के बाद दो घंटे तक बैठे रहे तथा माननीय विधि मंत्री को प्रवर समिति को विधेयक सौंपने से पूर्व भाषण देने की अनुमति दी गई, केवल तीन या चार वक्ताओं को सीमित समय दिया गया तथा 7 बजे सत्र के बाद प्रस्ताव पारित कर दिया गया। इसके बाद क्या हुआ? यह विधेयक प्रवर समिति को भेजा गया। प्रवर समिति ने इस पर रिपोर्ट भेजी तथा उस रिपोर्ट के प्रस्ताव पर विचार के लिए इस सदन में व्यवस्था का प्रश्न उठा। मैं व्यवस्था की उन महत्वपूर्ण बातों के बारे में कुछ बोलना नहीं चाहता। उन्हें निपटा दिया गया है। यह अधीरता इतनी अधिक थी कि गत सत्र में माननीय विधि मंत्री केवल यही चाहते थे कि विधेयक को विचार करने के लिए स्वीकार किया जाए और इस संबंध में कोई भाषण नहीं दिया गया। यह किसी तरह कार्य-सूची में सम्मिलित कर लिया गया। यह बहुत अच्छी तरह किया गया। व्यवस्था के प्रश्न निरस्त कर दिए गए और यह पाया गया कि यह सदन की क्षमता के अन्तर्गत था कि इस विधिकरण पर विचार किया जाए, जैसी कि प्रवर समिति ने रिपोर्ट की है। अब इस तरीके को देखिए, जिसके आधार पर इस विधेयक पर विचार किया जा रहा है। रेलवे बजट और आम बजट के बीच लघु अन्तराल में इस विधेयक पर विचार किया जा रहा है। इसके बारे में कोई गंभीरता नहीं है। कोई भी व्यक्ति इसका महत्व नहीं समझता। देश अधिकांशतः इस प्रक्रिया से आश्चर्यचकित है कि सुदूरगामी महत्व के विधान पर जिस प्रकार विचार किया जा रहा है कि आज जिस स्थिति में हैं, यदि आप इसे महत्वपूर्ण मानते हैं, यदि आप इसमें परिश्रमी हैं, यदि आप चाहते हैं कि कुछ किया जाना चाहिए, सुधार के रास्ते हिंदू कानून का निश्चित रूप से यह रास्ता नहीं है। इस विधेयक को विशेष सत्र में रखें। छोटे बैंकिंग विधेयकों और इसी प्रकार के अन्य विधेयकों पर आप कई-कई दिन लगा रहे हैं। ऐसी स्थिति होते हुए, क्या ऐसे विधेयक पर, जो हिंदू समुदाय के जीवन और आचार को नियमित करता है, अव्यवस्थित रूप से विचार किया जाना चाहिए, जैसा कि यहां किया जा रहा है? मैं ऐसे तरीके का घोर विरोध करता हूँ, जिसमें इस महत्वपूर्ण विधेयक पर विचार किया जा रहा है। आप जानते हैं कि कल 3 बजे रेलवे की पूरक मांग प्रस्तुत की गई थी और बाद में, आम बजट प्रस्तुत किया गया था। माननीय उपाध्यक्ष महोदय, मैं यह निवेदन करना चाहता हूँ कि मैं इस प्रकार के विधेयक के संबंध में इस प्रकार की प्रक्रिया अपनाने का अभ्यस्त नहीं हूँ। मैं विधानमण्डल के पुराने सदस्यों से पूछता हूँ कि वे इस प्रकार का कोई पिछला उदाहरण बताएँ।
बाबू रामनारायण सिंहः ऐसा कोई भी उदाहरण नहीं है।
पंडित लक्ष्मीकांत मैत्रेयः श्रीमान, प्रश्न यह है कि क्या इस संहिता को बनाने की कोई आवश्यकता है। मुझे बिल्कुल भी आवश्यकता नहीं लगती, क्योंकि मेरी विद्वान मित्र