104 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
श्रीमती दुर्गाबाई ने कहा है, हिंदू कानून सुस्थापित है और इसने लगभग सौ वर्षों से अपने स्वरूप को बनाए रखा है। पुराना हिंदू कानून, जब ब्रिटिश लोग यहां आए थे, भारतीय पंडितों की सहायता से समझाया जाता था। वे अपने को पंडित न्यायाधीश कहते थे, जिन्होंने स्मृतियों और धर्म शास्त्रों का विशद् अध्ययन किया था और वे कानून की व्याख्या करते थे। यह प्रक्रिया उस समय तक जारी रही, जब तक वे शेष स्मृतियों, निबंधनों तथा प्रथाओं से हिंदू कानून को बनाने वाले न्यायिक सिद्धांतों की प्रणाली का प्रादुर्भाव करने में सफल नहीं हो गए और जो अब कानून अपने कार्यक्षेत्र में सक्रिय हैं।
श्रीमान, यह सर्वविदित है कि हिंदू कानून विश्व में सबसे पुराना विहित विधि शास्त्र है।
डॉ. मॉन मोहन दास (पश्चिम बंगालः सामान्य)ः यह ठीक नहीं है।
पंडित लक्ष्मीकांत मैत्रेयः हाँ, हिंदू कानून ठीक नहीं है। हिंदू समाज ठीक नहीं है। हिंदू ठीक नहीं हैं। किसी भी व्यक्ति के लिए यह संभव नहीं है कि हर बार हस्तक्षेप करने पर उत्तर दिया जाए कि हिंदू कानून ठीक नहीं है। इस हस्तक्षेप में केवल तीन शब्दों का प्रयोग किया गया है। मैं नहीं समझता कि क्या तीन शब्दों में लगाए गए झाडू लगाते आरोप ‘ठीक नहीं हैं’ का जवाब देने की मुझमें क्षमता है। कोई प्रणाली अच्छी है या बुरी, यह समाज के निर्णय करने का विषय है। हताश अथवा असुन्तष्ट व्यक्तियों के लिए नहीं है। परन्तु मैं यह कह सकता हूँ कि इसकी दृढ़ता का सबसे विश्वसनीय प्रमाण यह है कि यह हिंदू कानून शताब्दियों के परीक्षण में स्थिर रहा है। कोई भी ऐसी पद्धति जो आन्तरिक रूप से बुरी, अस्थिर और न्यायविहीन हो, वह अधिक समय तक जीवित नहीं रह सकती। हिंदू कानून और उससे नियंत्रित हिंदू सामाजिक पद्धति जो उसके द्वारा शासित हुई है, उसके धक्कों तथा क्रान्तियों को सह चुकी हैं जो गत काल-खंडों में देश में वेग से आती रहीं। ऐतिहासिक विभीषिकाओं ने कई देशों यथा मिस्र, रोम, एसीरिया, बेवीलोनिया की प्राचीन सभ्यताओं को नष्ट कर दिया, जबकि हिंदू संस्कृति या समुदाय, जो अपने उद्गम की तारीख नहीं बता सकते, अभी तक अपनी पूरी शक्ति और ऊर्जा के साथ कार्य कर रहे हैं। और मुझे विश्वास है कि ईश्वर उसे तब तक कार्य करते रहने में सहायता करेगा, जब तक हम इन असंगत तथा हल्के तरीकों को अपनाकर इसकी नींव ही न खोद डालें। यदि हिंदुत्व की नींव में वास्तव में कुछ कमजोरी होती तो वह इतने दीर्घ समय तथा अवरोधक इतिहास के काल के विध्वंसों में अपना अस्तित्व बनाए न रख पाता। यह देश हजार वर्षों से अधिक समय तक विदेशी शासन-सत्ता के अधीन रहा है। इतिहास ही बताएगा कि भारत ने कैसी विचित्र अनुकूलता प्रदर्शित की है। प्रतिध्वनि से आपको विदित होगा कि हिंदू कानून में नम्यता और अनुकूलता के अंश हैं जिससे वह बदलती हुई आवश्यकताओं तथा समय की चुनौतियों को पूरा करने के लिए अपने को समायोजित कर लेता है।