(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 121

106 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

मार्गदर्शन करना है, अपने जीवन का मार्गदर्शन करते हैं और इस कानून के उपबंधों द्वारा अधिशासित होते हैं? क्या इस प्रकार की मांग रही है? मेरे मित्र दक्षिण पक्ष कहते हैंः नहीं यह बिल्कुल सही है।

श्री एल. कृष्णास्वामी भारतीः वे आपका समर्थन करते हैं।

पंडित लक्ष्मीकांत मैत्रेयः मेरे माननीय मित्र कहते हैं, वे मेरा समर्थन करते हैं। वे सच का समर्थन करते हैं। देश को आश्चर्य होगा कि हम कर क्या रहे हैं। हमें अपनी आत्मा पर इस प्रकार की चापलूसी का मरहम नहीं लगाना चाहिए कि हम कोई बुद्धिमानी का कार्य कर रहे हैं। मैं जानता हूँ कि मैं अपने को धोखा नहीं दे सकता, जैसाकि आप अपने को धोखा दे रहे हैं। यदि यह बुद्धिसंगत होता तो मैं यह आवश्यक न समझता कि इसे संहिताबद्ध करने का प्रयत्न किया जाए, क्योंकि मैंने इस बारे में कारण बता दिए हैं। आप इसको एकरूपता नहीं दे सकते चाहे कुछ भी क्यों न हो। और यदि हिंदूवाद कुछ भी है तो इसकी विविधता में ही सैद्धांतिक एकता भी है। यही हिंदुत्व का सारतत्व बनाते हैं, हिंदू कानून और हिंदू संस्कृति। इतने बड़े विशाल देश में आप स्वाभाविक भिन्नता की अवहेलना करते हुए किसी प्रकार की मानकीकृत एकता की आशा नहीं कर सकते। यदि आपने आशा की तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि आपको संताप उठाना पड़ेगा। आप इसको अभी महसूस नहीं कर सकते, परन्तु समय आने पर आप इसे महसूस कर सकेंगे। इन सभी के बाद, यहां तक कि इस संहिताकरण के बाद क्या इससे आपके उद्देश्य की पूर्ति हो रही है? मेरा कहना है, नहीं। कल मैसूर के माननीय सदस्य ने अपना भाषण दिया था। उन्होंने कहा था, अब कार्य इतना सरल हो गया है कि चार आने या छः आने का प्रकाशन लेने पर आपको विदित हो जाता है कि हिंदू कानून क्या है। कई मित्रों ने जोर से कहा, बिल्कुल ठीक। बिल्कुल ठीक। परन्तु क्या ये उत्साही सदस्य यह महसूस करते हैं कि इस विधेयक के प्रस्तावक तक यह आशा नहीं करते कि वह हिंदुओं के इस पूरे कानून को संहिताबद्ध कर देंगे। वे अपनी प्रस्तावना में एक शालीन-सा दावा करते हैं, जो असंगत दावा नहीं हैः उनका कहना हैः

फ्जहां यह समीचीन है कि भारत के प्रान्तों में वर्तमान में लागू हिंदू कानून की कुछ धाराओं का संशोधन और संहिताबद्ध किया जाए।य्ख्...,

अतएव, क्या किए जाने का प्रस्ताव है? कुछ धाराओं को संहिताबद्ध करने का यथा विवाह का कानून, उत्तराधिकार का कानून और गोद लेने का कानून। मोटे तौर पर कहा जाए तो वे मुख्य बातें यही हैं।

श्री एल. कृष्णास्वामी भारतीः तो बचा क्या?

पंडित लक्ष्मीकांत मैत्रेयः मेरे माननीय मित्र पूछते हैं कि हिन्दू कानून में बच क्या गया है। क्या मेरे माननीय मित्र सोचते हैं कि यही सब कुछ है, जिसके लिए हिंदू