(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 123

108 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

के लिए रामवाण है, जिनमें हिंदू-रक्त के संबंध को ही उत्तराधिकारी समझा जाता है। क्या वे वास्तव में विश्वास करते हैं कि इस संहिता की 139 धाराएं विटामिन की गोलियां, जो समस्त हिंदू समाज को सशक्त बना देंगी? आप इस विचार को मान सकते हैं, सदन इसे मान सकता है, मैं उस विचार को नहीं मानता। इसके विपरीत मेरा विचार है कि यह संहिता नितांत अपरिपक्व है,अपूर्व है। यदि हिंदू संहिता को कानून बना लिया जाता है, तो भी यह संहिता तब तक लागू नहीं की जा सकती, जब तक प्रान्तीय सरकारें अपने प्रान्त में इसी प्रकार के विधान पारित न कर लें, कृषि-भूमि के हस्तान्तरण के लिए। प्रत्येक प्रान्त को ऐसा करना होगा, ताकि इसके बाद यह अधिनियम सभी प्रांतों में लागू किया जा सके। इस समय मैं राज्यों के बारे में नहीं कह रहा हूँ, मैं प्रान्तों के बारे में बता रहा हूँ। इसके अलावा यह विचारणीय नहीं है कि प्रांत अलग-अलग निर्णय कर सकते हैं। यह बात केन्द्रीय सरकार के लिए नहीं है कि प्रान्तीय सरकारों को बाध्य किया जाए कि वे उत्तराधिकार की श्रेणी विशेष के लिए विधान तैयार करें, उसके निर्देश के अनुसार कृषि-सम्पत्ति के हस्तान्तरण की श्रेणी विशेष में तैयार करें। इसके बाद धरातल पर प्रांतीय स्वायत्तता असफल हो जाएगी और मैं आश्वस्त हूँ कि प्रांतीय मंत्रालय केन्द्र से आए ऐसे किसी भी प्रस्ताव को हाथ नहीं लगाएंगे, चाहे जितनी शक्ति से कहा गया हो यदि यह निर्देश उनके अपने विचारों के विरुद्ध हो।

माननीय उपाध्यक्षः क्या मैं सदन की सूचना के लिए यह बताऊं कि अभी 37 सदस्य हैं, जिनके बोलने के लिए अपनी पर्ची या पत्र मुझे प्राप्त हुए हैं जिनमें से अधिकांश सदस्य विधेयक के बारे में अपने विचार व्यक्त करने के लिए आतुर हैं। यदि सभी सदस्यों को अवसर नहीं दिया जा सकता कि वे अपने विचार व्यक्त करें तो मैं यह सुझाव दूंगा कि माननीय सदस्य का भाषण कितना ही रोचक क्यों न हो, फिर भी जो मुद्दे उठाए गए हैं विधेयक के पक्ष में कृपया दसरे सटीक उत्तर दूसरे पक्ष को देने दें। ताकि सभी बिन्दुओं पर विचार हो सके और ये अच्छी बहस के लिए लाभकारी होगा। डॉ. अम्बेडकर ने संहिता के बारे में दलीलों सहित स्पष्ट विश्लेषण दे दिया है। अलबत्ता सदन यह जानना चाहेगा कि ये बातें गलत क्यों हैं और दूसरी ओर उन्हें किस प्रकार पूरा किया जा सकता है। अतः अधिक ध्यान उन्हीं बातों की ओर दिया जाना चाहिए तथा उन वक्ताओं की ओर भी ध्यान देना चाहिए, जो प्रतीक्षा सूची में हैं।

श्री एच.वी. कामथः श्रीमान, क्या मैं आपसे निवेदन कर सकता हूँ कि इस विधेयक के अत्यधिक महत्व की दृष्टि से दो या तीन दिनों का समय अपर्याप्त होगा और कम से कम एक सप्ताह या दो सप्ताह का समय सामान्य बहस के लिए दिया जाना चाहिए।

पंडित लक्ष्मीकांत मैत्रेयः श्रीमान, आपने जो विचार व्यक्त किए हैं, मैं उनका बहुत आदर करता हूँ। यदि मैंने यह छाप छोड़ी है कि मैं अंड़गेबाजी कर रहा था, तो मुझे इस पर खेद है। मैं आपसे निवेदन कर सकता हूँ, श्रीमान, कि यह विधेयक अत्यधिक