109
महत्व का है और सदन के लिए यह नितांत अनुचित होगा कि आप हमें यह कहें कि इस सामान्य बहस को विराम देते हुए निष्कर्ष पर पहुंचा जाए, क्योंकि प्रथम अवस्था में हमें तनिक भी अवसर नहीं मिला कि हम भाषण दे सकें। अब ऐसी अवस्था है जब हम विधेयक के सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्ध हैं जिस स्थिति में हमें यह देखना है कि कब उत्तम तरीके से हम अपने देश की सेवा कर सकते हैं, सीमित स्थितियों में भी। यदि अभी 36 वक्ता बोलने के लिए प्रतीक्षारत हैं, तो यह स्पष्ट संकेत है कि विधेयक ने गंभीरता से ध्यान आकर्षित किया है और वे इस संबंध में अपने विचार व्यक्त करना चाहते हैं। इसलिए विधेयक पर चर्चा के लिए प्रस्तावित समय-सीमा की पवित्रता विशेष का कोई महत्व नहीं है।
यदि हम आज चर्चा के निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाते, तो निसंदेह आगे बहस के लिए अधिक दिनों की आवश्यकता होगी। माननीय विधि मंत्री इस बारे में अधिक उत्साही हैं, वह इसके लिए एक अतिरिक्त सत्र दे सकते हैं। यदि ऐसा नहीं हो सकता तो अतिरिक्त चार या पांच दिन इसी सत्र में दिए जा सकते हैं। विषय पर पूर्ण रूप से बहस की जानी चाहिए, मुझे आशा है कि सदन इसकी समाप्ति के लिए स्वीकृति नहीं देगा और न ही मैं विचार करता कि मुख्य सचेतक द्वारा बहस की समाप्ति के लिए प्रस्ताव प्रस्तुत किया जाएगा और इस प्रकार के प्रस्ताव की समाप्ति सचेतक द्वारा तब तक नहीं की जा सकती, जब तक जान लिया नहीं जाता कि विधेयक पर पूर्ण और पर्याप्त बहस हो चुकी है।
श्री एच.वी. कामथः एक दूसरी बात है, श्रीमान! क्या मैं आपसे निवेदन कर सकता हूँ कि प्रांतीय विधानसभा के सदस्य जो यहां उपस्थित नहीं हैं, को आमंत्रित किया जाए और वे बहस में भाग लें?
माननीय उपाध्यक्षः अब हम सदन को स्थगित करेंगेख्...,
पंडित लक्ष्मीकांत मैत्रेयः श्रीमान, मैंने अभी तक अपना भाषण समाप्त नहीं किया है। मैं समझता हूँ दोपहर के भोजन के बाद पुनः मुझे भाषण प्रारंभ करने दिया जाए।
माननीय उपाध्यक्षः जी हां, अब हम दोपहर के भोजन के लिए सदन को स्थगित करेंगे। सदन तब दोपहर के भोजन के लिए ढाई बजे तक स्थगित होती है।
दोपहर के भोजनावकाश के बाद ढाई बजे पुनः सदन की कार्रवाई प्रारंभ की गई। तब श्री एस.वी. कृष्णामूर्ति राव (अध्यक्ष के पैनल से एक सदस्य) ने अध्यक्ष का आसन ग्रहण किया।
पंडित लक्ष्मीकांत मैत्रेयः भोजनावकाश के लिए सदन के स्थगित होने से पूर्व मैं यह बात स्पष्ट करने का प्रयत्न कर रहा था कि यह संहिता कुछ खास वजह से उद्देश्य में असफल रहेगी। मैंने यह स्पष्ट किया था कि संहिताबद्ध करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि हिंदू कानून सभी दृष्टि से सुस्थापित ही नहीं है, बल्कि उन लोगों को अच्छी