(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 125

110 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

तरह पता भी है, जो उसके द्वारा शासित होते हैं। मैंने यह भी स्पष्ट किया था कि जो व्यक्ति इस अधिनियम को व्यवहार में लाते हैं, मेरा अभिप्राय न्यायाधीशों तथा देश की न्यायपालिका से है, जिसमें उच्चतम न्यायालय भी सम्मिलित है, उन्होंने कभी भी यह मांग नहीं की है कि इस कानून को संहिताबद्ध किया जाए और मैंने यह भी स्पष्ट किया है कि इस विधेयक का कार्यक्षेत्र अत्यंत सीमिति है। इसमें विवाह, गोद लेने और उत्तराधिकार की व्यवस्था किए जाने के अलावा अन्य अनेक क्षेत्रों के बारे में कुछ भी नहीं कहा गया है। कृषि-भूमि का उल्लेख करते समय, मैं सदन को यह बता सकता हूँ, कि इस देश में अनेक न्यायिक निर्णयों के अनुसार, भूमि के प्रश्न में अनेक प्रकार के हित और विषय निहित और स्वीकृत हैं, जो सर्वोच्च श्रेणी के जमींदारों से लेकर भूमि जोतने वालों तक हैं, जो हल चलाने वाले हैं और यदि अलग-अलग प्रांतीय सरकारें केन्द्रीय अधिनियम में दिए गए तरीकों से भिन्न तरीकों से सम्पत्ति के वितरण को नियमित करती हैं, इस तरह की उलझन से और भी गड़बड़ी हो सकती है।

श्रीमान, इसके बाद मैं यह कहना चाहूंगा कि इस संहिता ने अपने सीमित क्षेत्र में विद्यमान हिंदू कानूनों को अपने में समाहित करने की कोशिश की है और इस प्रक्रिया में कई ऐसी बातें मिला दी गई हैं_ जिनमें विवाह और उत्तराधिकार भी शामिल हैं, जो स्थापित हिंदू विचारों के विरुद्ध हैं। इसलिए यह केवल समाहित करने, ठीक करने और संशोधन प्रस्तुत करने का प्रश्न नहीं है, क्योंकि संशोधन अति सौम्य शब्द है। यह अपेक्षा से कहीं अधिक परिणाम देता है। यह नई खोज करता है, दूरगामी परिवर्तन करता है। केवल विवाह संबंधी कानून में ही, अपितु उत्तराधिकार के कानून में भी ऐसा करता है। श्रीमान, मैं चाहता हूँ कि सदन को उन सभी परिवर्तनों के बारे में स्पष्ट रूप से बता सकूं जो इस विधेयक में निहित हैं। परन्तु मैं पूर्णरूप से यह कार्य सम्पन्न करने में सक्षम नहीं हूँ। मैं शीघ्रता से यह स्पष्ट करने का प्रयत्न करूंगा कि मैं इन परिवर्तनों के बारे में क्या सोचता हूँ।

दो कोटि के परिवर्तन, मेरे मत में और मेरे देश के एक बड़े वर्ग के मत में मूलभूत और अत्यधिक प्रभाव डालने वाले हैं। इन दोनों का संबंध विवाह और उत्तराधिकार से है। श्रीमान, मेरे माननीय मित्र ने निस्संदेह अपनी संहिता में सांस्कारिक विवाह के लिए व्यवस्था की है। मैं नहीं जानता कि यदि इस देश में, उस क्षण तक, जब तक इस विधेयक का मसौदा तैयार किया गया था तथा उसे यह रूप दिया गया जैसा कि वह अब है, क्या वास्तव में लोगों ने इस देश की सरकार से यह मांग की थी कि वह कोई ऐसी प्रक्रिया प्रस्तावित करे, जिससे इस देश में विवाह सम्पन्न किए जाएं। मेरे विचार से यह किसी व्यक्ति का मामला नहीं है कि इस विधेयक से पूर्व लोगों ने अपने विवाह न किए हों या हमारे विवाह करने में काफी कठिनाई रही हो! परन्तु विवाह में किस प्रकार सुधार किया जाएगा, मैं नहीं जानता। इन विवाहों के लिए मेरी सिद्धान्तिक आपत्ति यह