112 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
बाबू रामनारायण सिहः ऐसा ही होना चाहिए।
पंडित लक्ष्मीकांत मैत्रेयः इस देश में अथवा अन्य किसी देश में तलाक की संस्था उस समुदाय के कल्याण को प्रोन्नत करने में सक्षम नहीं पाई गई है, जिसके लाभ के लिए यह विद्यमान है। समाज विज्ञान का विनम्र विद्यार्थी होने के नाते मुझे विवाह संबंधी अदालतों की रिपोर्टें पढ़ने का अवसर मिला है। एक माननीय सदस्य ने न्यायाधीश लिंडसे का संदर्भ दिया है और मुझे विश्वास है कि वे भी ‘युवाओं का विद्रोह’ के बारे में भी विचार करते होंगे। मैं नहीं जानता कि क्या मेरे माननीय मित्र ने यह महसूस किया कि उन्होंने इस प्रकार के विवाह का विरोध करने के लिए अनजाने में ही एक सशक्त दलील दी, जब उन्होंने उस महान न्यायाधीश का संदर्भ दिया। मैं चाहता हूँ कि माननीय सदस्य सावधानीपूर्वक विचार करें, यदि परिवार की परिधि में पुरुष और उनकी मां के भाई की बेटी अथवा पिता की बहन की बेटी के साथ वैवाहिक संबंधों की अनुमति देनी चाहिए, जैसी कि इस हिंदू संहिता में व्यवस्था की गई है।
श्री एच.वी. कामथः यह आम बात है।
पंडित लक्ष्मीकांत मैत्रेयः यह दक्षिण भारत के लिए आम हो सकती है, परन्तु दक्षिण भारत ही समस्त भारत नहीं है। मेरी मूल बात यह है कि देश के किसी विशेष भाग में किसी विशेष प्रकार की प्रथा है, तो आपको यह देखने के लिए अपने रास्ते से भटकना नहीं चाहिए, कि वह पूरे देश के लिए लागू हो जाए।
मैं ऐसे प्रांत का हूँ जो दक्षिण में नहीं है। यह पिछड़ा हुआ प्रांत है, शैक्षिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी पिछड़ा हुआ है। आप उसे कुछ भी कह सकते हैं। उसे बंगाल का पिछड़ा प्रांत कह सकते हैं। वहां जो परिवार रह रहे हैं, मैं उनकी घरेलू परिस्थितियों से अवगत हूँ। आप बंगाल के किसी प्रकार में जाएं तो आप देखेंगे कि बेटे, बेटियों और अन्य स्वाभाविक उत्तराधिकारियों के अलावा संबंधियों के सभी रूप, बहन के बेटे, भतीजे, भतीजियां, मामा के बेटे, चाचा की बेटियां आदि, सभी परस्पर संबंधित हैं तथा संयुक्त परिवार पद्धति से जुड़े हुए हैं। वे सभी नैतिक और धार्मिक प्रभावों द्वारा नियमित और संयमित हैं। आप वहां यही स्थिति सभी परिवारों में देखेंगे।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर (विधि मंत्री)ः कठिनाई क्या है?
पंडित लक्ष्मीकांत मैत्रेयः निःसंदेह, कुछ नहीं है, आप समाज की चिन्ता नहीं करते, आप ऐसे समाज में विश्वास करते हैं, जहां केवल सामाजिक तितलियां हैं, जो इधर-उधर शहद चूस रही हैं तथा आमोद-प्रमोद में लीन हैं। परन्तु मैं ऐसे समाज के लिए हूँ जिसने भारत के लिए ऐसा स्थान प्राप्त कर लिया है अथवा भविष्य में प्राप्त करेगा, जो उसका अपना है। वह स्थिति जिसके लिए विश्व ने इस देश का आदर किया है। यदि आप इन बातों को त्याग देते हैं, यदि आप एक विवरण पत्रिका के रूप में