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हिंदू संहिता प्रस्तुत करते हैं, जहां आप सभी प्रकार के विवाहों को पाते हैं अर्थात् प्रथम चचेरे-ममेरे भाई-बहनों और रक्त के संबंधों में विवाह के लिए स्वीकृति देते हैं और यदि इन सभी कौटुंबिक अगम्यागमन के विवाहों को विधिसम्मत ठहराते हैं, तो समाज नैतिक पतन में धंस जाएगा।
श्री एल. कृष्णास्वामी भारतीः मैं ‘अगम्यागमन’ शब्द के प्रयोग का विरोध करता हूँ। यह बिल्कुल गलत है कि ऐसी पद्धति की तीव्र भर्त्सना की जाए तो देश के एक बड़े भाग में प्रचलित है। यह उस पूरे प्रांत पर आक्षेप है।
माननीय अध्यक्षः शांत-शांत।
पंडित लक्ष्मीकांत मैत्रेयः इसलिए मैं कर नहीं सकता परन्तु ऐसी पद्धति के विरोध में अपना स्वर ऊंचा करता हूँ क्योंकि मैं समझता हूँ कि चचेरे भाई-बहनों के बीच विवाह जैव और संतानोत्पत्ति की दृष्टि से समाज कल्याण के लिए भी उपयुक्त नहीं है तथा हिंदू कानून के उद्देश्य के विरुद्ध है।
श्री एल. कृष्णास्वामी भारतीः नहीं, ऐसा नहीं है।
पंडित लक्ष्मीकांत मैत्रेयः केवल समाज के दृष्टिकोण से ही नहीं, अपितु पारिवारिक जीवन की शान्ति और शुद्धता के लिए भी यह उचित नहीं है। अतः मैं चाहता हूँ कि इसकी भर्त्सना की जानी चाहिए। यह अनैतिक एवं अत्याचारपूर्ण है।
श्रीमान, मेरी माननीय बहन दुर्गाबाई ने ठीक ही कहा है कि एक पत्नीत्व विवाह का विरोध नहीं किया जाना चाहिए। मैं सदन में किसी माननीय सदस्य को नहीं जानता जो वास्तव में एक पत्नीत्व विवाह को नहीं मानेगा। हम में से प्रत्येक एक पत्नीत्व विवाह चाहता है। यह केवल हमारी पसंद के लिए ही नहीं, अपितु परिस्थितियों ने भी हम पर दबाव डाला है कि एकपत्नीत्व विवाह को स्वीकार किया जाए। यह सत्य है कि हमारे देश में उच्च वर्गों से बहुपत्नीत्व विवाह पूर्णतया समाप्त हो गया है और यह कानून द्वारा नहीं हुई है। यही मेरा मुख्य मंतव्य है कि यदि आप सामाजिक बुराई को समाप्त करना चाहते हैं, तो आपको आन्तरिक ढंग से काम करना चाहिए ऊपर से नहीं। यदि हमारे माननीय सदस्य इस देश के इतिहास का अध्ययन करें, तो वे मेरे कथन को अधिक सही पाएंगे। हम सब विधवाओं के दुःख और कष्टों से भली-भांति अवगत हैं। ऐसे कई उदाहरण हैं जिनमें ऐसी बाल विधवाएं और युवा विधवाएं सम्मिलित हैं, जो हमारे दिल तोड़ देती हैं अथवा किसी न किसी प्रकार हमारे हृदय तोड़ने के लिए है। वास्तव में, गत पीढ़ी के प्रतिष्ठित एवं पंडित विद्यासागर इससे इतने अधिक प्रभावित हुए थे कि उन्होंने हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम पारित करा लिया। परन्तु देश इस अधिनियम को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था और इसका परिणाम क्या हुआ? यह अधिनियम वास्तव में व्यर्थ हो गया और अभी तक ऐसा ही बना हुआ है। ऐसी स्थिति उन सभी सामाजिक विधानों की होनी है, जो समाज के भीतर से उठी माँग के अनुसार नहीं बने हैं।