114 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
मैं सदन को बता रहा था कि बहुपत्नीत्व वास्तव में देश से कई ऐसे विभिन्न कारणों से विलुप्त हो गया, जैसे वैवाहिक जीवन के उत्तरदायित्व की बढ़ती हुई समझ, महिला वर्ग में बढ़ती हुई चेतना तथा इसके अलावा सभी प्रकार की शक्तियों की अन्योन्य क्रियाएं जिसमें सबसे अधिक आर्थिक शक्ति है, जो यह असंभव बना देती है कि भोग-विलास एक ही समय में कई पत्नियों के साथ में डूबे रहा जाए। इसलिए मैं कहता हूँ कि इसके लिए विधान की कोई आवश्यकता नहीं है, वह स्वतःमृत हो गई है। यह रिवाज अब अनुपयोगी बन गया है। यह दलील दी जा सकती है कि समाज में कुछ ऐसे स्तर भी हैं जहां इसका चलन है। वहां भी मैं चेतावनी देना चाहता हूँ। आप उसे बल अथवा बाध्य करा कर नहीं रोक सकते। आपको जनमत तैयार करना होगा और जब हमारे अभागे भाई इस पद्धति की बुराई को महसूस कर लेंगे, तो वे उसे त्याग देंगे। दूसरी ओर बिना उनके जीवन-स्तर को ऊंचा उठाए बिना शिक्षा तथा लोकमत द्वारा उनमें चेतनता पैदा किए। यदि आप यह प्रयत्न करते हैं कि किसी विधान को उनके गले में उतार दिया जाए, तो मैं आपसे निवेदन करूंगा कि आप यह महसूस करें कि इसका उस पर क्या प्रभाव होगा। जैसे मेरी माननीय बहन बता रही थीं कि वे यह कहेंगे, यह हमारा समाज है, यह लोहे का ऐसा ढांचा है जो हमें दूसरी पत्नी को रखने की अनुमति नहीं देगा। तब हम समाज के दूसरे रूप में प्रवेश करेंगे, दूसरे धर्म को स्वीकार करेंगे जहां इसकी अनुमति है। कोई भी समाजविज्ञानी, कोई भी आदमी जो सामाजिक सुधार में रुचि रखता है, उसकी ओर भी ध्यान देगा। यह भय बिल्कुल ऐसा नहीं है, जिसका आधार न हो। जो भी हो, मैं यह महसूस करता हूँ कि यदि आपने हिंदू कानून को संहिताबद्ध किया है तो जो किया जाना चाहिए, वह यह कि विवाह की जो आवश्यकताएं हैं, वे प्रस्तावित की जाएं, करार करने वाले पक्षों की आवश्यकताओं को निर्धारित किया जाए, उनकी उम्र उनकी मानसिक और शारीरिक क्षमताएं, प्रतिबंधित रिश्ते और इसी प्रकार की अन्य बातें जो व्यक्ति सामाजिक समारोहों और उत्सवों में विश्वास करते हैं, वे अनुष्ठानिक विवाहों को स्वीकार कर सकते हैं। परन्तु विवाह की आवश्यक शर्तों की दृष्टि से सांस्कारिक विवाह और सिविल विवाह में अन्तर नहीं होना चाहिए। यदि देश में अन्तर्जातीय विवाहों के मांग है तो मैं तो मैं वहां खड़ा नहीं रहूँगा। यदि लोग जातियों से बाहर विवाह करना चाहते हैं तो उन्हें 1874 सिविल विवाह अधिनियम के उपबंधों को प्रत्येक दशा में स्वीकार करना चाहिए। इस समय उन लोगों के मार्ग में कोई अवरोध नहीं है, जो अपनी जातियों के बाहर विवाह करने को उत्सुक हैं। यदि अन्तर्जातीय लड़कों और लड़कियों के बीच विश्वसनीय प्रेम है तो ऐसा नहीं है कि हम उन्हें रोक रहे हैं अथवा उन्हें अलग कर रहे हैं। वर्तमान कानून के अन्तर्गत उन्हें खुली सुविधाएं प्राप्त हैं, कानून जिसका उल्लेख मैंने पहले किया है। आप इस कानून को बदल भी सकते हैं। आप कुछ प्रावधानों को निरस्त अथवा संशोधित भी कर सकते हैं कि उस अधिनियम के अन्तर्गत विवाह करने वाले अपने बच्चों को उत्तराधिकार अधिनियम द्वारा शासित नहीं करेंगे जो वर्तमान में हैं अपितु हिंदू कानून द्वारा