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शासित करेंगे। मुझे इस संबंध में कोई आपत्ति नहीं है, पर मैं यह समझने में असमर्थ हूँ कि क्यों हिंदू संहिता में सांस्कारिक विवाह के साथ-साथ सिविल विवाह की अनुमति दे रहे हैं। इसे पूर्णतः संहिता से बाहर किया जाना चाहिए क्योंकि उसका इसके साथ कोई संबंध नहीं है। सभी के लिए सिविल विवाह कानून अलग होना चाहिए।
श्रीमान, मैं व्यक्तिगत रूप से यह महसूस करता हूँ कि यदि आप उसमें तलाक के प्रश्न पर भी जोर देते हैं, तो आपको देश में सर्वत्र कठिनाई का सामना करना पड़ेगा और जब तक आप अपने कानों में रूई नहीं ठूंस लेते, जैसा कि हममें से अधिकांश लोग बतौर जनता सेवक करते हैं, तो आपको बहुत कुछ मूल्य चुकाना होगा। अतः किसी भी दशा में मैं बतौर हिंदू जोरदार ढंग से हिंदू विवाह की पद्धति में तलाक की अपधर्मी संकल्पना के आरंभ किए जाने का विरोध करता हूँ।
अब हमें उत्तराधिकार के प्रश्न पर विचार करना चाहिए। इस बारे में भी अभिनवीकरण हुआ है, यद्यपि मैं इसके विवरण के बारे में अधिक विस्तार से विचार नहीं करना चाहता। परन्तु इस बारे में मैं अपनी माननीय बहन श्रीमती दुर्गाबाई को बताना चाहूँगा कि हम प्राचीन हिंदू कानून पुरोधाओं के निर्णय में दृढ़ विश्वास रखते हैंः हम सभी पुरुष और महिलाओं की समता में विश्वास रखते हैं। यद्यपि उस अर्थ में नही जैसा कि वे अथवा उनके मित्र बात करते हैं। समानता, अवसर की समानता के अर्थ में होनी चाहिए। आप पुरुष तथा स्त्री को शारीरिक दृष्टि से एक समान नहीं बना सकते। इसलिए समानता का कुछ अन्य अर्थ होना चाहिए। महिलाओं के साथ हीनता की भावना नहीं हो, बेटियों की शिक्षा अथवा उनके विवाह के संबंध में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं हो। हमारे शास्त्रों में व्यवस्था हैः
फ्कन्याप्येवं पलनिय, शिक्षानियतिगातन्त देय भोरय विदुष, दान रत्न समन्विताय्
जिसका अर्थ यह है कि बेटी को भी लड़कों के समान शिक्षा दी जानी चाहिए और समय आने पर उसका उचित वर के साथ विवाह कर देना चाहिए तथा उसे प्रचुर मात्रा में दहेज तथा आभूषण भी देने चाहिए। और मेरे समाज अर्थात् हिंदू समाज में बताया गया हैः
फ्यत्र नार्यस्तु पूज्यंते, रमंते तत्र देवताय्
इसका अर्थ यह है कि ईश्वर परिवारों को आशीर्वाद देता है, जहाँ महिलाओं का सम्मान किया जाता है। महिलाओं को हिंदू समाज में उच्च और प्रतिष्ठित स्थान दिया गया है। मैं इस बात से इनकार नहीं करता कि कुछ ऐसे कठोर मामले भी हो सकते हैं, ऐसे कठोर मामले भी हैं, जहां महिलाओं के साथ वैसा व्यवहार नहीं होता, जैसा कि होना चाहिए। परन्तु यदि आज अपने ऋषियों तथा सन्तों, विधिवेताओं अथवा नेताओं के आदर्शों से हट गए हैं, तो उन्हें दोष ही दिया जा सकता, क्योंकि उन्होंने आपको नीचा