117
एक माननीय सदस्यः विधि मंत्री जानते हैं।
पंडित लक्ष्मीकांत मैत्रेयः वे जान सकते हैं, वे विद्वान हैं। हमारे एक अमर कवि ने ‘शकुन्तला’ में लिखा है कि शकुन्तला के विवाह के उपरान्त अपने पति के घर के लिए प्रस्थान करते समय एक श्लोक है जो अपने में शास्त्रीय है और तथा जो सारांश में यह बताता है कि हिंदू विधिवेत्ता तथा हिंदू समाज उसके कुमारीत्व के बारे में क्या विचार करते हैं। जैसे ही शकुन्तला ने अपने पति के घर जाने के लिए आश्रम छोड़ा, ऋषि कंव ने कहा, फ्आज मैं मुक्त महसूस कर रहा हूँ।य्µ
फ्अर्थो ही कन्या परकिया ऐव तमं अद्ध सम्देश्य प्रतिग्रहिता
जाति मयायंग विशदः प्रकाय प्रत्यार्पित नस्य इवन्तरात्म्य्
फ्यह मेरा हृदय, मेरी अन्तरात्मा, आज भारी भार से मुक्त हो गई है और मैं अन्तरात्मा की मुक्ति के आनन्द से ओत-प्रोत हूँ।य् आखिर वह भार क्या था? बेटी एक परिवार में किसी अन्य व्यक्ति के घर की धरोहर या अमानत है और जैसे ही वह धरोहर सही स्वामी को सौंप दी जाती है, तो राहत मिलती है। मैं भी आज महसूस करता कि शकुन्तला को उसके पति को सौंपते हुए इन दिनों नहीं जहां कानून की अपनी सीमा है। अपितु मैं ‘न्यास’ के उन दिनों का उल्लेख कर रहा हूँ। न्यास का अर्थ जमा अथवा ट्रस्ट है। यदि मेरे माननीय मित्र डॉ. कामथ इससे आगे व्याख्या चाहते हैं, तो मैं सदन के बाहर अपने कक्ष में देने को पूरी तरह सहमत हूँ।
श्री एच.वी. कामथः परन्तु मैं ‘डॉक्टर’ नहीं हूँ?
पंडित लक्ष्मीकांत मैत्रेयः आप डॉक्टर से भी अधिक हैं। आप डॉक्टर, दार्शनिक, वकील और विधायक हैं। मैं आपका बहुत आदर करता हूँ। आप बहुत अच्छे हैं और इन सबसे ऊपर देशभक्त हैं।
श्रीमान, लड़कियों के बारे में यही संकल्पना है। इसलिए यदि हिंदू कानून देने वालों ने परिवार में उन्हें बेटों के समान स्वामित्व का अधिकार नहीं दिया गया तो इसका कारण लड़कियों के प्रति विमुखता या अरुचि नहीं है अपितु इसका एकदम सरल कारण यह है कि लड़की पति के परिवार के लिए बनी है। उसे उस परिवार की अभिन्न अंग नहीं माना जाता जहां उसका जन्म हुआ है। यह पूरी बात है और इसलिए अन्याय अथवा असमानता का प्रश्न नहीं उठता। मैं किसी भी हिंदू कानून के उस स्कूल के बारे में नहीं जानता जो देश के किसी भाग में प्रचलित हो और जहां बेटी को अपने पिता की सम्पत्ति में बेटे के समान भाग दिया गया हो।
श्री ए. करुणाकरण मेनन (मद्रासः सामान्य)ः यह प्रचलन मलाबार में विद्यमान है।