(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 133

118 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

पंडित लक्ष्मीकांत मैत्रेयः मुझे प्रसन्नता है कि दक्षिण में इस प्रकार की अनेक बातें प्रचलित हैं।

श्रीमती ऐनी मेसकेरीन (ट्रावनकोर राज्य)ः ट्रावनकोर में भी बेटों और बेटियों को समान भाग दिया जाता है।

पंडित लक्ष्मीकांत मैत्रेयः मैं इस सूचना के लिए आभारी हूँ परन्तु इस प्रकार की सूचना दक्षिण से आती है, और यदि दक्षिण के मेरे मित्रख्...,

श्रीमती हंसा मेहता (बम्बईः सामान्य)ः क्या दक्षिण में वे हिंदू नही हैं?

पंडित लक्ष्मीकांत मैत्रेयः जी हाँ, परन्तु यदि वे गौरवान्वित हैं कि यह सब कुछ दक्षिण में है, तो उन्हें तो वे इससे इंकार न हो कि उत्तर तथा उत्तर-पूर्व के अपने शिष्टाचार तथा रिवाज़ों के प्रति हमें भी गौरवान्वित होने का हक है। यह मेरा उनसे नम्र निवेदन है। मैं इस प्रकार की बहस पसन्द नहीं करता। यदि बम्बई में किसी प्रकार के उत्तराधिकार, किसी प्रकार की विरासत का अधिकार प्रचलित है अथवा देश के किसी अन्य भाग में यह उचित माना जाता है, इसे बंगाल और अन्य भागों में लागू किया जा सकता है। इन सब पर बात किए बगैर कि यह एक ऐसा पौधा है, जो किसी विशेष प्रकार की माटी में पैदा होता है और बढ़ता है। यदि किसी विशेष संस्था को दक्षिण में अधिक सफलता से काम करना पाया जाता है तो उसे वहां कार्य करने दिया जाए। परन्तु यदि वह उत्तर अथवा पूर्व, अथवा पश्चिम की माटी के लिए वह उपयुक्त नहीं है, तो मैं कोई कारण या संगतता नहीं देखता कि उसे बलपूर्वक वहां रोपा जाए।

वास्तव में हिंदू संहिता में सबसे गंभीर आपत्ति यह है कि सैद्धान्तिक समानता की सनक में आप विविधता की पूरी तरह अवहेलना कर देते हैं। आपको कुछ बातें इस भू-भाग में मिलेंगी और कुछ बातें उस भू-भाग में, इससे यह विदित होता है कि हमारे विशाल देश में विशेष स्थानों अथवा क्षेत्रों की आवश्यकताओं के अनुसार विशेष प्रकार के शिष्टाचार और रिवाज़ विकसित हो गए हैं। उन्हें निर्बाध छोड़ देना चाहिए। तथापि विधेयक की धारा 7 में अधिक्रमण शक्ति की व्यवस्था की गई है, जिसके द्वारा सभी प्रथाएं और प्राचीन रिवाज़, जिन्हें प्रचलित कानून की शक्ति प्राप्त है, हटा दिए जाने चाहिए। मैं सोचता हूँ कि यही धारा 7 है।

एक माननीय सदस्यः यह धारा 4 है।

पंडित लक्ष्मीकांत मैत्रेयः मैं अपने मित्र का संशोधन-प्राधिकार स्वीकार करता हूँ। श्रीमान, यह मेरा मत है कि यह स्थिति अत्यंत आपत्तिजनक है, क्योंकि किसी प्रथा का स्पष्ट प्रमाण कानून के पाठ को भी पीछे छोड़ देता है। यह एक सुप्रसिद्ध सुस्थापित कथन है कि प्रथाओं और शिष्टाचार की विभिन्न विविधताएं हैं, क्योंकि लोगों की