(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 139

124 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

है। मुझे इस पर परिश्रम करने की आवश्यकता नहीं है, मेरा विश्वास है कि निश्चय ही सम्पत्ति के अधिक टुकड़े हो जाएंगे। इससे अनावश्यक रूप से वसीयत करने की स्थिति पैदा होगी। फलस्वरूप मुकदमेबाजी बढ़ेगी और अन्ततोगत्वा बरबादी होगी।

एक माननीय सदस्यः हाँ, दो गलतियों एक सही नहीं बनातीं। क्योंकि वहां पहले से ही टुकड़े हैं, यह कोई तर्क नहीं है कि अधिक भाग करने के लिए सम्पत्ति के और अधिक टुकड़े किए जाएं, श्रीमान, वसीयत उत्तराधिकार के इस क्षेत्र में एक नवीकरण को सामने रखा गया है, और मैं सोचता हूँ परिवर्तनों में ज्यादा विनाश है।

पंडित लक्ष्मीकांत मैत्रेयः हाँ।

श्री बी. दासः यह विधेयक का सिद्धान्त नहीं है। आप उसे छोड़ सकते हैं।

पंडित लक्ष्मीकांत मैत्रेयः तो बिल का सिद्धांत क्या है?

श्री वी. दासः मैं विभाजन का संदर्भ दे रहा हूँ और यह मुख्य सिद्धान्त नहीं है।

पंडित लक्ष्मीकांत मैत्रेयः वसीयत उत्तराधिकार का तरीका इस विधेयक की रीढ़ है। इस अधिनियम के अधीन आप मिताक्षर कानून को मिटा रहे हैं। इसके बारे में कोई भूल न करें, क्योंकि जन्म और उत्तरजीविता द्वारा सम्पत्ति पर ऐसा अधिकार समाप्त होने जा रहा है, जो मिताक्षर की नींव है। कानून की मिताक्षर पद्धति सैकड़ों वर्षों से देश को शासित कर रही है, जब तक कि बंगाल में स्वाभाविक न्याय और प्रेम के सिद्धान्त पर आधारित दायभाग पद्धति प्रारंभ नहीं हुई। मेरे कई मित्रों ने, जो इस विधेयक के समर्थक हैं, मुझे बताया है कि मैं अंतिम आदमी होऊँगा इसका विरोध करके जितना संभव हो क्योंकि मरे उत्तराधिकार का सिद्धांत जो दायभाग कानून में निरुपित है, मेरे प्रांत का है। उन्हें मेरा यह उत्तर था कि यह बात मुझे संतोष नहीं देती। मैं तब भी उसे नहीं चाहूंगा यदि भारत में सामाजिक सुधारों के समर्थक चाहते हों कि ऐसा किया जाना चाहिए। चाहने वाले भी इसकी मांग करते हैं। यहां तक कि कोई अतिमानव या तानाशाह आए और मुझसे कहेः इधर देखिये, बंगाल में प्रचलित उत्तराधिकार का कानून समस्त भारत में लागू किया जाना चाहिए। मैं पहला व्यक्ति रहूँगा। इसके विरुद्ध आवाज उठाने। पुरानी पद्धति समय के साथ

खरी उतरी है। यह परिवर्तन मेरे प्रांत के अनुकूल हो सकता है, परन्तु संपूर्ण भारत के लिए नहीं। मैं नहीं चाहता कि उत्तराधिकार के इस मिताक्षर कानून को ऐसे कानून के पक्ष में हटा दिया जाना चाहिए, जो न तो उत्तराधिकार का मिताक्षर कानून है और न ही दायभाग का कानून है। यह दोनों का ऐसा संकर मिश्रण है, जो किसी के भी कल्याण के लिए नहीं है और इससे हिंदू समाज के टुकड़े-टुकड़े हो सकते हैं और उसका पतन हो सकता है, क्योंकि यह पूर्णतया सुव्यवस्थित व्यवस्था को अव्यवस्थित कर देगा।

मैं समझता हूँ कि मैंने सदन के धैर्य को थका दिया है और मुझे अपने भाषण