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की समाप्ति कर देनी चाहिए ( माननीय सदस्यगणः नहीं, नहीं)। मैंने विरासत के उत्तराधिकार के बारे में कहा है, मैंने विवाह के बारे में कहा है। मैं महसूस करता हूँ कि हिंदू कानून की यह दो शाखाएं, जिनमें जबरदस्त ढंग से संशोधन किया जाना है को पूरे आयाम के साथ विचार किया जाना चाहिए। परन्तु भारत में हिंदू समाज के लिए दुःखांत स्थिति होगी यदि सुधार के नाम पर हिंदुओं को उनके सुरक्षित और प्राचीन बंधनों से अलग कर दिया जाए जो शताब्दियों के दबावों और झंझावातों से उसे बचाते रहे हैं। मुझे पुनः दोहराने दें कि हमारे शास्त्रों द्वारा सामाजिक जीवन के सभी प्रकार के मामलों के लिए पर्याप्त उपबंधों को बनाने के अलावा स्थानीय रिवाज़ों और प्रथाओं को सुस्थापित करने के लिए व्यापक क्षेत्र छोड़ा गया है। वे अपने प्रभाव में अभिनंदनीय रहे हैं। समाज में स्थिरकारी शक्तियों के रूप में यदि हम उनकी अवहेलना करते हैं तथा संहिताकरण का ताजिब बनाते हैं, तो हम हिंदू कानून को नितांत अनम्य, कठोर और ढलवा लोहे का सांचा के रूप में रूपांतरित करेंगे। हम उसमें अनावश्यक चरित्र का आयात करेंगे जो उसका कभी नहीं रहा। हम इसे किसी ऐसे रूप में बदल देंगे, समय की मांगों के साथ कभी भी समझौता नहीं करेगा जैसा कि यह अतीत में करता था।
श्रीमान, मैं अपने निष्कर्ष पर पहुँचने के पूर्व उस दलील के बारे में कुछ कहना चाहूँगा, जिसे यहां प्रस्तुत किया गया है। परन्तु उन लोगों ने इसे सरल ढंग से बिल्कुल अलग कर दिया है जो इसे पसन्द नहीं करते। यह दलील दी गई है, और मैं समझता हूँ कि यह बिल्कुल ठीक है, कि यह विधानसभा इस बारे में प्राधिकृत नहीं है।
श्री एल. कृष्णास्वामी भारतीः विधि के अनुसार अक्षम?
पंडित लक्ष्मीकांत मैत्रेयः जी हां, मैं महसूस करता हूँ कि यह सक्षम नहीं है। किसी भी दशा में यदि आप इसके वैध गठन का सहारा लेते हैं, तो मैं आपको कहूँगा कि नैतिक दृष्टि से इस संहिता को पारित कराने के लिए आपके पास कोई निरापद तर्क नहीं है। मैं जानता हूँ कि यह आपत्ति न केवल हम जैसे लोगों द्वारा नहीं उठाई गई थी, परन्तु उन लोगों द्वारा भी, जो इस देश के राजनीतिक जीवन में बहुत ऊंचा स्थान रखते हैं उच्च राजनैतिक पस्ता के लोगों द्वारा जैसे प्रतिष्ठित और उच्च स्थान प्राप्त माननीय डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद, अध्यक्ष भारतीय संवैधानिक सभा, प्रभु सत्तात्मक निकाय, जिसमें मौसम-बेमौसम हम शपथ लेते रहते हैं। मैं जानना चाहता हूँ, हमारे द्वारा सर्वोत्तम तरीके से विचार किए जाने के लिए उनके दृष्टिकोण का महत्व है या नहीं? व्यक्तिगत रूप से मैं उनका सर्वाधिक सम्मान करता हूँ। वे न केवल बिहार के मुकुटविहीन सम्राट हैं अपितु वे भारत के विवादहीन नेताओं में से एक हैं। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने यथासंभव सबसे ज्यादा स्पष्ट संकेत दिया है। वे केवल बिहार के लोगों का ही नहीं जानते, अपितु बंगाल के साथ-साथ अन्य प्रांतों के लोगों को भी जानते हैं। उन्होंने कलकत्ता में अपनी वकालत प्रारंभ की थी और अपनी आधी आयु बीतने तक वे कलकत्ता में रहे। यह केवल नकारने