(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 144

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भी मद्धिम गति से चलना चाहिए। उस बारे में मेरे मन में तनिक भी संदेह नहीं है। परन्तु यह विधेयक इतनी मद्धिम गति से आगे बढ़ा है कि हममें से कुछ सदस्यों ने ठीक ही शिकायत की है कि वह इतना पहले पारित न हो। जहां तक मैं जानता हूँ कि यह विधेयक अथवा इस विधेयक के मुख्य उपबंध इस सदन या उससे पूर्व के सदन और देश के समक्ष साथ ही बार के सदस्यों के समक्ष भी लगभग आठ वर्ष तक विचाराधीन रहे। यह कल्पना से भी नहीं कहा जा सकता कि इस विधेयक को इस सदन अथवा देश द्वारा आश्चर्यजनक ढंग से विचारार्थ स्वीकार किया गया है।

मुझे 1945 का स्मरण अच्छी तरह है, आम चुनाव के समय एक समूह द्वारा मेरा विरोध किया था मुख्यतया क्योंकि मैं सुधार का पक्षधर था क्योंकि हिंदू कानून को संहिताबद्ध करने के प्रति में कटिबद्ध था। यह तथ्य है कि मैं निर्वाचित हुआ था। मैं अब भी यहां है, यह संकेत है कि मैं अपने निर्वाचन-क्षेत्र के लोगों के विचार व्यक्त करता हूँ।

मेरे माननीय मित्र पंडित मैत्रेय ने एक बात कही है कि यह सदन इस प्रकार के विधेयक को पारित करने के लिए सक्षम नहीं हैं। मेरे विचार से यह आपत्ति गत पन्द्रह वर्ष में कई बार सुनी है और यह बात उसी समय कही गई है, जब इस सदन के समक्ष किसी समाज सुधार के विधेयक पर बहस की गई। इसका परिणाम क्या हुआ, इसे भी प्रत्येक व्यक्ति जानता है। यदि यह सदन स्वतंत्र भारत के लिए संविधान पारित करने के लिए सक्षम है, तो मैं नहीं समझता कि यह सदन इस विधेयक को पारित करने के लिए सक्षम नहीं है। मेरे माननीय मित्र पंडित मैत्रेय ने अपनी वैयक्तिक अपील पर बल देने के स्थान पर, माननीय डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद द्वारा व्यक्त विचारों पर प्रकाश डाला है। वास्तव में मैं और इस सदन का प्रत्येक सदस्य माननीय डॉ. राजेन्द्र प्रसाद का बहुत आदर करते हैं। फिर भी एक हमारा कर्तव्य है जो इस सदन का प्रत्येक सदस्य अपनी अन्तरात्मा, अपने निर्वाचन-क्षेत्र और ऐसे महान देश के प्रति रखता है, जिसमें वह रहता है। जो प्रत्येक वस्तु से ऊपर उठकर है, केवल इसलिए नहीं कि वह विधायक है, अपितु ऐसा व्यक्ति है, जो हिंदू समाज के पुनर्निर्माण की कल्पना करता है और वह अपने कर्तव्य में असफल रहेगा यदि वह किसी प्रसिद्ध व्यक्ति अथवा किसी अन्य प्रसिद्ध व्यक्ति के वैयक्तिक विचारों पर ही विचार करेगा। जब मैं यह कहता हूँ तो किसी अनादर की भावना से नहीं कहता, अपितु मैं महसूस करता हूँ कि किसी व्यक्ति के प्रति आदर रखने की भावना से कहीं अधिक ऊंचा है।

मुख्य बात है कि क्या हिंदू कानून को संहिताबद्ध करने का समय नहीं आया है? क्या समय नहीं आया है कि विवाह, गोद लेने, उत्तराधिकार और दूसरी बातें जो निर्माण करती हैं, जिसे हिंदू कानून कहा जाता है। हिंदू कानून के स्रोत कई हैं। मैं इसका सविस्तार वर्णन करना नहीं चाहता और मैं इस सदन का अधिक समय भी नहीं लेना चाहता। परन्तु यह एक स्पष्टतः स्थापना का मामला है कि विधि के व्याख्या की परिभाषाओं के बारे