130 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
में एकरूपता होनी चाहिए। यदि कानून स्पष्ट नहीं है, यदि कानून में एकरूपता नहीं है, तो समाज के स्थायित्व को हानि उठानी पड़ती है। यदि हम आधे दर्जन उच्च न्यायालयों की किसी विशेष पीठ के संबंध में अलग-अलग व्याख्याएं देखते हैं, तो मैं सोचता हूँ कि समय आ गया है कि इन सभी को विराम दिया जाना चाहिए।
इसके अलावा, मेरे माननीय मित्र ने मत व्यक्त किया है कि हम हिंदू समाज को नष्ट करने का प्रयत्न कर रहे हैं। मेरी अपनी भावना यह है कि इस सदन में लगभग 290 व्यक्ति हैं जो हिंदू समाज के निकट सम्पर्क में हैं। हम यहां एक स्थान पर आ सकते हैं, अपने विचारों को ताजी हवा दे सकते हैं और किसी समझौते या समायोजन पर पहुंच सकते हैं तथा हिंदू समाज की ओर अधिक प्रगति के लिए विधान पारित कर सकते हैं। जब मनु, पाराशर और याज्ञवल्क्य ने अपनी स्मृतियों को लिखा था तो उन्हें इस बात का लाभ नहीं था, मैं कहना चाहूँगा किसी विधान का। निस्संदेह वे महान थे, पर महान् पुरुषों का वंश उन्हीं के साथ समाप्त नहीं हो गया। मेरे बाईं ओर एक ऐसे व्यक्ति हैं, जो विद्धता और चरित्र में इतने महान् व्यक्ति हैं कि यह गलत नहीं होगा यदि मैं उनकी तुलना प्राचीन ऋषियों और विधिवेत्ताओं से करूं। आज उनकी बुद्धिमत्ता और विद्धता ही है कि वे सभी 290 सदस्यों से सहायता और सहयोग की अपेक्षा करते हैं। मैं सोचता हूँ कि उनके हाथ सशक्त हैं और उनके विचार हमें अभिभूत करते हैं।
मुख्य बात यह थी जैसी कि मैंने कही थी, कि क्या कुछ सुधारों के लिए समय आ गया है और क्या हिंदू कानून को संहिताबद्ध करने का समय आ गया है? यदि समय आ गया है, तो इसमें कोई अंतर नहीं पड़ता कि कोई व्यक्ति संहिता बनाए और देश उसको स्वीकार करे अथवा चाहे वह संहिता लोकतांत्रिक तरीके से बहस की प्रक्रिया द्वारा स्वीकार की जाए और देश उसको स्वीकार करे। मुख्य बात यह है कि इसे परखा जाए। बिना किसी आवेग, किसी पक्षपात और किसी अतिवादी विचारों के वशीभूत हो। हमें इस सदन में इस संहिता को गुणों के आधार पर परखना है न कि किसी भावना के आधार पर।
अंततोगत्वा ऐसा क्या है, जो इस संहिता में प्रस्तुत है? उत्तराधिकार के प्रश्न के सिवाय ऐसा कुछ भी नहीं है जिसके बारे में, वास्तव में न सुना हो या सहमति प्रकट नहीं की गई हो। मेरा अपना विचार है कि इसमें दो महत्वपूर्ण बातें हैं जिन पर विवाद केन्द्रित है। उनमें से एक विवाह है_ और दूसरी हिंदू कानून में समांशिता को समाप्त करना है। जहां तक विवाह का संबध है इसमें कुछ भी क्रांतिकारी नहीं है। आजकल जब प्रत्येक वस्तु राज्य के अधिकाधिक नियंत्रण में आ रही है और हम राष्ट्रीयकरण की बातें कर रहे हैं, तो मेरा विचार कि निजी उद्यम के लिए केवल विवाह ही बचा है।
श्री नजीरुद्दीन अहमदः इसका भी राष्ट्रीयकरण कर दिया जाए।