(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 146

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माननीय श्री एन.वी. गाडगिलः अब इस विधेयक में एक स्वर्णिम अर्थ उभरने लगा है। इस क्षेत्र में प्रवेश ओर निकासी इस प्रकार नियमित की गई है कि पश्चिमी दुनिया से आने वाला आधुनिक व्यक्ति निश्चय ही हमारे पिछड़ेपन पर हंसेगा। वह कहेगा कि यदि विवाह ऐसा मामला है जिसमें दोनों को परमानन्द प्राप्त होता है, तो तलाक के आधारों में से एक आधार स्वभाव की विसंगति होनी चाहिए। क्या आप वहां तक पहुंच पाए हैं? इस विधेयक में दिए गए आधार बहुत संकीर्ण हैं। वास्तव में मैं तो कहना चाहता हूँ कि यह अत्यंत संतुलित उपाय है। आप ऐसी पत्नी की आशा नहीं करते जो पागल, कोढ़ी आदि हो और इस विधेयक में ऐसा कुछ भी नहीं है जो स्मृतियों के उपबंधों के विरोध में दौड़ता हो अथवा जो हिंदू समाज और संस्कृति की प्रकृति के प्रतिकूल हो। हम में से अधिकांश स्मृति को जानते हैंःµ

‘नष्टे मृते प्रब्रजित, क्लीबेच पतिते पतो।

पतिः अन्यत् तु नारीणाम् विधीयते।’

आधार प्राचीन ग्रंथों में दिए गए हैं, पर यदि इसके कुछ भी समीप है, वह आज हिंदू समाज में प्रचलित नहीं है, क्योंकि हम जड़ हो गए हैं और प्रगति की ये सभी गतिशील प्रथाएं रोक दी गई हैं। आखिरकार, हिंदू समाज में कौन और किसी सीमा तक इसको प्रभावी बनाएगा? यदि मेरे प्रान्त की ही बात की जाए, 90 प्रतिशत लोग किसी न किसी प्रकार से तलाक लिए हुए हैं। कानून के अनुसार नहीं, अपितु प्रथा के अनुसार। यह उच्च वर्ग के उन लोगों में दो या तीन प्रतिशत हैं, जो इस विधेयक का विरोध करते हैं। परन्तु यदि उचित ढंग से ध्यान दिया जाए, तो शिक्षित वर्ग इसके पक्ष में ही है।

एक ओर, मैं इस बात से सहमत हूँ कि तलाक को बहुत आसान या सस्ता नहीं बनाना चाहिए तथा स्वभाव की विसंगति को इसका आधार नहीं होना चाहिए। परन्तु दूसरी ओर, विवाह को उम्र कैद भी नहीं समझना चाहिए, यदि परोक्ष रूप से ऐसा होता है। आखिरकार, जैसे विवाह का वैयक्तिक पक्ष है, वैसे ही इसका सामाजिक पक्ष भी है। यदि पति और पत्नी दोनों ही सहमत नहीं होते तो अनबन और कटुता तथा सामंजस्य का अभाव केवल परिवार के आहते तक ही सीमित नहीं होता, अपितु इसका व्यापक अनुप्रयोग और प्रभाव होता है, जो समाज और उसके चारों ओर वातावरण दूषित करता है। यदि किसी विधिवेत्ता की इच्छा है कि वह जो भी विधान चाहता है, पारित हो जाए, उसे विचारित मुद्दे पर अपेक्षित परिणम देने की क्षमता होनी चाहिए तब हमें यह निर्णय करना चाहिए कि क्या हमारे साथ कुछ ऐसा हुआ है जो वास्तव में हमें वैसे ही परिणाम देता है जिसके लिए हमसे कहा गया है। यह आत्मविश्लेषण का विषय है। यदि आज हम उन लोगों को विवाह-बंधन से अलग होने का कोई मार्ग दे रहे हैं, जो प्रगट रूप से खुश नहीं हैं। इससे उबरने को तो हम केवल वही कर रहे हैं, जो मैं समझता हूँ, हमारा सामाजिक कर्तव्य है।