(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 147

132 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

जहां तक विवाह का संबंध है, मैं नहीं समझता कि हम उन व्यक्तियों के बीच विवाह के लिए आपत्ति कैसे कर सकते हैं, जो अलग-अलग जातियों के हैं। वर्ष 1949 में यह एक दुःखद समीक्षा होगी। हमारे प्रगतिशील चेहरे पर यदि किसी एक व्यक्ति

खड़ा हो और कहें कि हाँ, अलग-अलग जातियों के व्यक्तियों के विवाहों को विधि सम्मत नहीं बनाना चाहिए। स्वतंत्र भारत में, मेरे विचार से एक जाति है, स्वतंत्र व्यक्ति की जाति। एक ही धर्म है और वह मानवता का धर्म है। ( श्री एच.वी. कामथः और स्वतंत्र महिलाएं।) देश के सामने सुधार तभी तक रहा है कि वे जो यह महसूस करते हैं कि इसका अर्थ हिंदू समाज को विखंडित करना है, प्रगतिशीलता के दुश्मन हैं। मेरे मत के अनुसार ऐसे हिंदू समाज को विखंडित हो जाना चाहिए। यह क्या बात है कि किसी व्यक्ति को अछूत कहा जाता है क्योंकि उसका जन्म किसी विशेष जाति में हुआ है। मैंने किसी भी लड़के को झाडू के साथ पैदा होते नहीं देखा है, मैंने किसी भी लड़के को ब्राह्मण के परिवार में यतोपनीत के साथ पैदा होते नहीं देखा है न ही किसी लड़के को मारवाड़ी परिवार में तराजू के साथ पैदा होतेः

जन्मना जायते शूद्रः संस्कारात द्विजोच्यते वियया याति विप्रत्वं त्रोभिः श्री त्योच्यतो चते।

अर्थात् सभी शूद्र पैदा होते हैं और संस्कारों के बाद व्यक्ति उच्च स्तर प्राप्त करता है तथा जब वह शिक्षा और उपलब्धियों की अलग-अलग अवस्थाओं से गुजरता है तो वह श्रोत्रिय हो जाता है। यही हिंदूत्व की वास्तविक भावना है, न कि वह भावना जो हमारे कुछ प्राचीन सनातन धर्म के अनुयायी मित्रों द्वारा यहां और बाहर की जाती है। यदि इस महान देश का उद्देश्य यह है जैसा कि बताया जाता है, कि वर्गहीन समाज बनाया जाना है, तब हमें इसके बारे में देखना चाहिए कि इसके लिए उपयुक्त संस्थाएँ, सामाजिक और राजनीतिक दोनों प्रकार की पैदा और विकसित की गईं हैं। इसलिए मैं समझता हूँ कि इस संहिता में विवाह के संबंध में जो भी सिफारिशें की गई हैं, वे केवल नितांत आवश्यक ही नहीं, वे अपितु ज्यादा दूर भी नहीं होना चाहिए। परन्तु जैसा कि मैं अपने माननीय मित्र पंडित मैत्रेय के साथ सहमत हूँ कि हमें सामाजिक मामलों में धीमी गति से चलना चाहिए, मैं उनकी इस बात से कुछ समय के लिए समहत हूँ।

सबसे विवादास्पद अंश पूरे विषय का सह-समांशिता को हिंदू समाज से अलग कर देना है। इस पर लोक मत के बारे में कुछ कहा गया था। प्रेस और बार के बारे में कुछ कहा गया था। हमारे प्रान्त में भी एक संस्था है जिसका नाम ‘धर्म निर्णय मण्डल’ है। उस मंडल में महामहोपाध्याय तर्कतीर्थ विद्यावाचस्पति जैसे उच्च शिक्षा तथा विद्धता वाले लोग शामिल हैं। अभी हाल ही मैं उन्होंने एक प्रस्ताव पारित किया है और प्रस्तावित हिंदू संहिता पर अपने विचार व्यक्त किए हैंःµ