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‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता’
और उसके बाद यही कहना चाहते हैं कि उसे या तो न्यायालय का द्वार खटखटाना चाहिए अथवा अपने भरण-पोषण की मांग करनी चाहिए तो मैं कहता हूँ कि यह स्थिति उचित नहीं है।
मेरी अपनी भावना यह है कि प्रारंभ में कुछ कठिनाई आ सकती है जब नई संस्थाएं आएंगी, जब नए विचार उत्पन्न होंगे, समाज को कुछ समय अपने को समायोजित करने में भी लगेगा। प्रश्न यह नहीं है कि ये कठिनाइयां बड़ी या छोटी हैं_ संगत प्रश्न यह है कि क्या प्रस्तावित नवीन प्रबंध अच्छा है या बुरा है? यदि आप इस बात से आश्वस्त हैं कि वह अच्छा है तो स्वाभाविक रूप से समायोजन में कुछ कठिनाई होगी। पर हमें कठिनाई के बारे में तनिक भी चिंतित नहीं होना चाहिए।
यह बताया गया है कि जैसे ही विवाह सम्पन्न हो जाता है, दुल्हा कुछ दिक्कतें पैदा करना प्रारंभ कर देता है, या कोई अन्य उपाय से, उस हिस्से के लिए जो उसकी पत्नी को उसके माता-पिता से मिली है। यह स्थिति अधिवक्ताओं के लिए स्वागत योग्य होगी। अच्छा! जब आप अधिकाधिक संभव तरीके से राष्ट्रीयकरण की ओर बढ़ रहे हैं तब ऐसा बहुत कम शेष होगा, जिसके बड़े परिणाम होंगे और लोग सम्पत्ति के उस छोटे भाग के लिए भी न्यायालय में जाएंगे, क्योंकि भविष्य में लड़के और लड़की दोनों के लिए सम्पत्ति का बहुत कम भाग बच पाएगा। और यदि इसके कारण मुकदमेबाजी होती भी है, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि हमें न्याय नहीं करना चाहिए? क्योंकि कानून द्वारा किसी भली बात को भी बुरा सिद्ध किया जा सकता है, तो क्या इसका यह अर्थ है कि इसका सभी के लिए निषेध करना चाहिए। यह बात सदन के निर्णय के लिए है। अब ऐसा समय आ गया है जब लिंग की समानता की सामान्य बात का, सम्पति के स्वामित्व की समानता द्वारा अनुसरण किया जाना चाहिए। यदि हम ऐसा नहीं करते, तो हमें पाखंड के अभियोग का सामना करना होगा।
मेरे माननीय मित्र पंडित लक्ष्मीकांत मैत्रेय ने महान हिंदू समाज के लिए सभी प्रकार की कठिनाइयों की भविष्यवाणी की है। इस प्रकार के भविष्यवक्ता पहले भी हुए हैं, परन्तु वे सभी झूठे सिद्ध हुए हैं। मुझे इसमें तनिक भी संदेह नहीं है कि हिंदू समाज की प्रकृति ऐसी लचीली है कि इसने अपने में विभिन्न संस्कृतियों को समाहित किया है। और यदि हिंदू समाज सफलतापूर्वक युग-युग से जीवित है, तो इसका कारण यह है कि जिन व्यक्तियों ने हिंदू समाज के मामलों का मार्गदर्शन किया है उन्होंने समय के साथ परिवर्तन का सुझाव दिया है। यही कारण है कि वह अब तक जीवित है। अब यहां भी इस बात का प्रयत्न है कि कानून को लोकमत के अनुकूल बनाया जाए। कानून यह करता है कि वह लोकमत को सुदृढ़ करता है, किंतु लोकमत अपने स्वभाव से