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अपेक्षा अधिक काम किया है। मैंने मुकदमेबाजी में भी भाग लिया है। तलाक के उपबंध अनंत मुकदमेबाजी पैदा कर देंगे और अनेक परिवारों के लिए अंतहीन जटिलताएं तथा कठिनाइयां होंगी और पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं को अधिक दुःख झेलने होंगे। एक अन्य महत्वपूर्ण बात पर सीधे ही ध्यान दिलाने के लिए मैं सदन के समक्ष इस विधेयक से संबंधित एक अधिक गंभीर मामले को प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह विधेयक गत 9 अप्रैल को विधानमंडल के समक्ष प्रस्तुत किया गया था। तब हमारी बहनों ने कहा था कि इस अवस्था में विधेयक का विरोध न किया जाए। तब यह विधेयक इतना महत्वपूर्ण समझा गया था कि कि उसके संबंध में ब्यौरेवार ध्यान देने की आवश्यकता नहीं हैµउसे पारित किया जाना चाहिए। इसलिए अंतिम दिन के अंतिम घंटे में हम इस पर विचार करने के लिए सहमत हो गए। मैंने हिंदू दृष्टिकोण से एक छोटी अपनी हल्की आपत्ति उठाई। क्या अब मैं मुस्लिम दृष्टिकोण से कोई आपत्ति उठा रहा हूँ। बिल्कुल नहीं अतः मेरी इस घोषणा पर कोई आश्चर्य या मजाक नहीं होना चाहिए, क्योंकि यह आपत्ति हिंदू-दृष्टिकोण से उठाई गई थी। यह हिंदू दृष्टिकोण ही है कि मैं उसके संबंध में बोल रहा हूँ। मेरी विदुषी बहन ने उस दिन मुझसे पूछा था, आप अपनी हिंदू बहनों को उनके उन अधिकारों से क्यों वंचित कर रहे हैं, जिन्हें आप अपनी खुद की बहनों के लिए दे रहे हैं? यह एक मूलभूत प्रश्न है। क्या मैं इसका उत्तर दे सकता हूँ? मेरा उत्तर है कि आप एक ही प्रकार का भोजन अलग-अलग किस्म के लोगों को नहीं दे सकते। आपको हिंदू महिला की स्थिति परखना है जो हिंदू कानून में कल्पना की गई है। आपको मुस्लिम महिला की स्थिति के बारे में विचार करना है, क्योंकि मुस्लिम कानून में अन्तर्निहित है। हम यहां किसी एक या दूसरी पद्धति की बुद्धिमत्ता के प्रश्न पर विचार नहीं कर रहे हैं। मैं यहां दो प्रकार के सदस्य पाता हूँः कुछ शाकाहारी और कुछ मांसाहारी। क्या आप मांसाहारी भोजन शाकाहारी को देंगे और यदि कोई किसी शाकाहारी व्यक्ति को शाकाहारी भोजन दें तो क्या आप उसे पक्षपात का दोषी मानेंगे? ( एक माननीय सदस्यः यह कोई तर्क है? बहुत ही अजीब-सा तर्क?) यह तर्क उतना ही तार्किक है, जैसाकि मेरी बहन श्रीमती रेणुका रे ने प्रश्न उठाया था। वह तार्किक नहीं था। आप दो अलग-अलग किस्म के लोगों को एक ही प्रकार का भोजन नहीं दे सकते_ वास्तव में वे अलग-अलग परिवारों में पैदा हुए हैं और उन्हें भिन्न-भिन्न प्रकार से पाला गया है।
यह विधेयक सदन में 9 अप्रैल को प्रस्तुत किया गया था। माननीय विधि मंत्री ने प्रवर समिति की रिपोर्ट का रहस्योद्घाटन करने वाला भाग सुनाया है। उन्होंने सरल भाव से स्वीकार किया है कि इस विधेयक पर प्रवर समिति को भेजने के पूर्व उसकी गुणवत्ता की दृष्टि से कोई विचार नहीं किया गया। यह अत्यंत विस्मयकारी वक्तव्य था। मूलतः विधेयक का सुव्यवस्थित मसौदा तैयार किया जाना था यानी एक अच्छा विधेयक यह विधेयक 9 अप्रैल को विधानमंडल द्वारा पारित किया और प्रवर समिति को विचारार्थ भेज दिया गया तथा इसके बाद यह महसूस किया गया कि इस विधेयक पर तकनीकी