(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 155

140 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

अथवा विभागीय दृष्टि से विचार नहीं किया गया था। ऐसा क्यों है? क्या मैं पूछ सकता हूँ, यद्यपि इस विधेयक पर विधि मंत्रालय द्वारा तकनीकी अथवा गंभीर विभागीय विचार नहीं किया गया था, इसी अवस्था में उसे शीघ्र प्रस्तुत कर दिया गया? (एक माननीय सदस्यः हम पहली अप्रैल को ही उसके बहुत निकट आ चुके थे।) ऐसा हो सकता है कि वह पहली अप्रैल को हमारे काफी निकट था और इस प्रकार की संभावना ने इस विधेयक को शीघ्र ही प्रस्तुत किए जाने के लिए बाध्य किया। शायद कोई गंभीर कार्य सम्पन्न किए जाने का अभिप्राय नहीं था, पर यह ऐसा संवेदनशील मामला था, जिसे हमारी बहनों के संतोष के लिए पारित किया जाना था। यह विधेयक महिला-भावना द्वारा अधिक प्रेरित है अपेक्षातया मामले की आवश्यकताओं की दृष्टि से विचार किए जाने से। अनंतर विभाग ने सबसे अधिक अप्रत्याशित कार्य हाथ में लिया। वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि इस विधेयक का मसौदा उचित रूप से तैयार नहीं किया गया था, इसमें कुछ गलतियां हैं और इस विधेयक को दूसरी बार देखा जाना आवश्यक था। इस विधेयक में अलग-अलग संख्याएं और अलग-अलग परिभाषाएं, जो एक-दूसरे से नितांत भिन्न हैं, के साथ कई अलग-अलग अध्यायों को शामिल किया गया है। विधायी विभाग ने इसे दोषपूर्ण विधेयक समझा है और मत दिया है कि इस विधेयक को समग्र रूप से फिर से तैयार किया जाना चाहिए।

मैं यह निवेदन करता हूँ कि जिस क्षण विधायी विभाग इस निष्कर्ष पर पहुंचा गया यही वह समय था कि इस विधेयक को वापिस ले लिया जाता और एक नया विधेयक बनाया जाता जिसे मंत्रालय स्वीकार करने की स्थिति में होता तथा उसे नए विधेयक के रूप में प्रस्तुत करता। ऐसा करने की बजाय विभाग ने विधायी मसौदा तैयार करने की ऐसी प्रक्रिया को अपनाया, जिसके बारे में मैं परिचित नहीं हूँ। भारत और विदेश के समग्र संवैधानिक इतिहास में ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलेगा कि विभागीय विधेयक प्रस्तुत किए जाने के बाद और प्रवर समिति को भेजने के बाद उसे विभाग द्वारा फिर से तैयार किया जा रहा है। श्री रामनारायण सिंह ने कल ही यह पूछा था कि मसौदा तैयार करने वाली समिति ने किस प्राधिकार से यह नवीन विधेयक तैयार किया था। ( एक माननीय सदस्यः यह नया विधेयक नहीं है।) मुझे यह बताने में दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति का सामना करना होगा कि इस विधेयक में पर्याप्त महत्वपूर्ण परिवर्तन किए गए हैं। यद्यपि माननीय विधि मंत्री ने कल ही इस प्रश्न का उत्तर देने से बचने का प्रयास किया था, फिर भी उन्हें अंत में यह स्वीकार करना पड़ा था कि उन्होंने कोई परिवर्तन नहीं किए हैं, बल्कि प्रवर समिति ने परिवर्तन किए हैं। मैं सदन के समक्ष यह प्रदर्शित करने की स्थिति में हूँ कि ये परिवर्तन पर्याप्त गंभीर और क्रांतिकारी थे तथा सारहीन परिवर्तन नहीं थे।

श्री एल. कृष्णास्वामी भारतीः श्रीमान, यह व्यवस्था का प्रश्न है। यदि माननीय सदस्य अपनी दलील इस आधार पर देना चाहते हैं कि वास्तव में जो विधेयक प्रवर