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समिति को पुनः विचार करने के लिए भेजा गया था, वह कोई अन्य विधेयक था जिस पर विचार किया गया था और वह कोई ऐसा विधेयक नहीं था, जो प्रवर समिति को भेजा गया था। इस संबंध में अध्यक्ष महोदय ने अपना विनिर्णय देकर इस प्रश्न का समाधान किया था। अतः अब उन्हें इस बात पर जोर देने की आवश्यकता नहीं है। हाँ, यदि उनके पास कोई अन्य कारण हैं तो वे ऐसा करने के लिए स्वागत योग्य है। वे इस संशोधन पर बोले रहे हैं कि यह विधेयक पुनः विचार के लिए प्रवर समिति को भेज दिया जाए। परन्तु यदि वे इस दलील पर बल देते हैं कि प्रवर समिति ने भिन्न विधेयक पर विचार किया, तब यह अध्यक्ष के उस विनिर्णय से नियमित हो जाता है, जिसमें उन्होंने कहा था कि यह वही विधेयक है।
श्री टी.टी. कृष्णमाचारी (मद्रासः सामान्य)ः यह खारिज करने का एक तर्क हो सकता है।
जहां तक सांसारिक प्रयोजनों का सम्बन्ध है, यदि कोई बेटा गोद लिया जाता है तो वह इसलिए कि वह बूढ़े पुरुष अथवा बूढ़ी महिला की सेवा करेगा, मैं समझता हूँ इसमें कोई फायदा नहीं है। इस समय रोगीगृह, अस्पताल और अन्य गृह हैं। यदि आपके पास कोई सम्पत्ति नहीं है, तो किसी बच्चे को गोद लेना बेकार है और कोई व्यक्ति आपकी केवल इसलिए सेवा नहीं करेगा कि आप ने उसे गोद लिया है। यदि आपके पास सम्पत्ति है, तो बुढ़ापे में आप की सहायता करने के लिए काफी संस्थायें हैं। मेरा तर्क यह है कि वर्तमान स्थिति में हमारे समाज में गोद लेने की प्रथा का कोई महत्व नहीं रह गया है।
जहां तक नाबालिगों और अभिभावकों का सम्बन्ध है, मैं नहीं समझता कि वह वर्तमान हिंदू कानून से किसी तरह भिन्न है। जहां तक उत्तराधिकार का सम्बन्ध है, मुझे
खेद है कि उत्तराधिकार के बारे में मुझे कोई विशेष प्रावधान देखने में नहीं आया है और मैं विश्वास के साथ नहीं कह सकता कि वर्तमान उत्तराधिकार पद्धति ठीक है या गलत। मैं एक बात कहूंगा कि सिद्धान्ततः एक लड़की को लड़के के साथ सह-वारिस बनाने में कोई बुराई नहीं है, क्योंकि महिला सम्पत्ति अधिनियम, 1937 की धारा 3 के अन्तर्गत मां को बेटे के साथ हिस्सा मिलता है। यदि एक लड़की भाई के साथ दाय पाती है तो इसमें आपत्ति की क्या बात है? यदि भाई के साथ मां, दाय पा सकती है तो भाई के साथ लड़की दाय क्यों नहीं पा सकती। पंडित भार्गव ने यह आपत्ति की कि दामाद घर में आकर परेशानी पैदा करेगा। यदि दो भाई परेशानी पैदा नहीं करते, तो दामाद क्यों परेशानी पैदा करेगा? आप कनाट प्लेस जायें, तो आपको पता चला जायेगा कि पति की नियति यह है कि वह पत्नी का कोट अपने कन्धे पर उठाता है और बिल का भुगतान करता है। अतः जब पत्नी नहीं चाहेगी, तो पति कैसे परेशानी पैदा कर सकता है?
एक माननीय सदस्यः ऐसा उत्तर भारत में होता है।