142 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
श्री कृष्ण चन्द्र शर्माः यह तो पुरुष की प्रगति है। मानवता का विकास क्रम यही है। आपकी मूंछे कहां गईं। यह एक सामान्य जैविक सिद्धांत है कि मादा कोशाणु विकसित होकर अलग हो जाते हैं और महिला का बेहतर विकास होता है। महिला, पुरुष की अपेक्षा अधिक गोरी, कोमल और सुन्दर होती है। प्रगति का यह सिद्धान्त है कि व्यक्ति अच्छाई और सौन्दर्य की ओर अग्रसर होता है। यदि आपका सुझाव इसके प्रतिकूल है, तो मैं समझता हूँ कि आप मानव नहीं हैं।
अब मैं संयुक्त हिंदू परिवार की ओर आता हूँ। मैंने इस सम्बन्ध में विशेषज्ञों की राय का विश्लेषण किया है। सभी विशेषज्ञ यह मानते हैं कि हिंदू रीति रिवाज उस समय बने जब हमारा समाज ग्राम्य अवस्था में था। उन परिस्थितियों में संयुक्त हिंदू परिवार व्यवस्था का होना आवश्यक था। इस समय कुछ कानून ऐसे हैं जिनके आधार पर हमने संयुक्त हिंदू परिवार सम्पत्ति की धारणा समाप्त कर दी है। संयुक्त हिंदू परिवार प्रथा उस समय बनी जब व्यापार और वाणिज्य अधिक नहीं था। एक किसान एक गाय को एक सौ रुपये की वस्तु के रूप में नहीं देखता, अपितु एक ऐसे जीवन के रूप में देखता है जो उससे जुड़ा हुआ है पवित्र है। अतः वह गाय को उसी रूप में देखता है और यदि लड़का गाय को लेकर परिवार से अलग हो जाता है, तो वह उससे पैसा लेना पसन्द नहीं करेगा, क्योंकि गाय एक पवित्र चीज है। यही कारण है कि हम गाय को गौ माता समझते हैं।
पंडित लक्ष्मी कांत मैत्रेयः क्या कोई गौ पिता भी है?
श्री कृष्ण चन्द्र शर्माः अब समय बदल गया है, इसलिए संयुक्त हिंदू परिवार का प्रश्न उठाना उचित नहीं है और इसे जरूरी नहीं समझा जाना चाहिये। इसे पवित्र भी नहीं माना जाना चाहिये, क्योंकि यह प्रथा उस समय बनी जब भारत में पहले आर्यों के समाज की स्थापना हुई थी।
दूसरी बात यह है कि यह कानून कृषि के मामले में लागू नहीं होता। जहां तक कृषि भूमि का सम्बन्ध है, नये कानून बन रहे हैं और उनमें उत्तराधिकार उसी आधार पर होगा।
इन शब्दों के साथ मैं इस विधेयक की इस सभा से स्वीकृति के लिए सिफारिश करता हूँ।
ऽश्री बी.एम. गुप्ता (बम्बईः सामान्य)ः महोदय, मैं सभा के समक्ष विधान को सीमित समर्थन देने के लिए खड़ा हुआ हूँ। इसका अर्थ यह नहीं है कि मैं यहां प्रस्तावित अनेकों सुधारों का विरोध करता हूँ। इसके प्रतिकूल मैं यह कहने के लिए तैयार हूँ कि वे सही दिशा में हैं, किन्तु उनमें कुछ सुधार और संशोधन करने की आवश्यकता है। संशोधन
ऽसंविधान सभा (विधायी) डी., खंड 6, भाग II, 12 दिसम्बर, 1949, पृष्ठ 502-504